गुरुवार, २ जुलाई २००९

पिछले दिनों दिल्ली जाने का इत्तेफ़ाक़ हुआ ।
मौक़ा बड़ा मुबारक था। चर्चित ब्लॉगर जनाब दर्पण साह के
दौलत-खाने पर एक अदबी-बैठक का एहतमाम किया गया था ...
जिसमे जनाब (मेजर) गौतम राजरिशी कश्मीर की वादियों से
ख़ास तौर पर शिरक़त के लिए तशरीफ़ लाये थे । जनाब प्रकाश 'अर्श' ,
जनाब मनु 'बे तखल्लुस', जनाब दर्पण साह और कुछ दुसरे दोस्तों की
हाज़िरी से "मिनी-मुशायरे" की जीनत में चार चाँद लग गए थे ।
'गौतम' और 'अर्श' का दिलफरेब तरन्नुम तो आज भी कानों में गूँज रहा है ।
एक ग़ज़ल आप सब के लिए हाज़िर करता हूँ । . . . बाक़ी मुशायरा

सुनने के लिए gautamrajrishi.blogspot.com पर क्लिक करें .

ग़ज़ल

शौक़ दिल के पुराने हुए
हम भी गुज़रे ज़माने हुए

बात आई - गई हो गयी
ख़त्म सारे फ़साने हुए

आपसी वो कसक अब कहाँ
बस बहाने बहाने हुए

दूरियाँ , और मजबूरियाँ
उम्र भर के खज़ाने हुए

याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए

भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए

खैर ! 'मुफ़लिस' तुम्हें क्या हुआ
खल्व्तों में ठिकाने हुए

_______________________________
मंज़र = दृश्य
खल्व्तों = एकांतवास

__________________________

48 टिप्पणियाँ:

MUFLIS ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Dr.T.S. Daral ने कहा…

शौक भी वही हैं,
फ़साने भी वही

दूरियां तो कभी थी नहीं,
मजबूरियां भी ख़त्म हुई

जो दिल में है,
लब पर भी वही

महफिल ज़माने को यार,
लो हम भी पहुच गए यहीं

जरा खिड़की से झांक कर देखिये, हम यहीं कहीं टोरंटो में घुमते हुए नजर आ जायेंगे. .

Harkirat Haqeer ने कहा…

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

वाह.....मुफलिस जी बहुत गहरी बात दोस्ती पर.....बहुत खूब......!!

भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए

ओये होए.....मनु जी ....ये किसकी बात हो रही है ....दिल्ली में तनहा तनहा तो न थे हजूर......मिट्ठू जा......?????

"अर्श" ने कहा…

मुफलिस जी नमस्कार,
वो शाम उम्र भर ना भूल पाने वाली एक शाम में शुमार होगई है
आपकी दिलकश आवाज़ में ये ग़ज़ल सुन चुका हूँ , इस ग़ज़ल के बारे में कुछ कह पाना
लाज़मी नहीं है हर शे'र उम्दा है , किस शे'र पे कितनी दाद दूँ
ये हैरत-ऍ-सोच में हूँ.... और आपकी ये खाकसार वाली बात सही नहीं है
आप तो आदरणीय है और साथ ही मंच संचालक भी..
आपका प्यार और आर्शीवाद हमें मिला ये हमारे लिए
बड़ी बात है...
आपका
अर्श

‘नज़र’ ने कहा…

छा गये आप

---
विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

शूरु के चार शेरों का हाल ये रहा कि शेर खतम हुआ और दस्तक दिल पर हुई....! अब इससे ज्यादा क्या कहें कि थोड़ी देर को हम भी गुज़रे जमाने के पुराने शौकों में चले गये।

हर शेर बेहतरीन...!

sandhyagupta ने कहा…

Bahut khub!Bahut khub!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

दूरियाँ , और मजबूरियाँ
उम्र भर के खज़ाने हुए

आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए

भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए

ऐसे लाजवाब शेर कहना किसी उस्ताद के बस की ही बात है...मुफलिस साहेब एक बार फिर आपने एहसास के गहरे रंगों से हम सब को तर बतर कर दिया है...लाजवाब शायरी है आपकी सुभानाल्लाह...
आप के आखरी वाले याने ...शायरी के बहाने हुए...को पढ़ कर जनाब जाँ निसार अख्तर साहेब का एक शेर याद आ गया:

"ये इल्म का सौदा , ये किताबें , ये रिसाले
इस शक्श की यादों को भुलाने के लिए हैं."

नीरज

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

शानदार और मुकम्मल छोटे बहर की इस ग़ज़ल के हर शेर बहुत ही खूबसूरत हैं.
बधाई स्वीकार करें , निम्न शेर पढने के बाद दोगलों की याद ताज़ा हो आयी...............

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

बधाई स्वीकार करें

चन्द्र मोहन गुप्त

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

मुफ़लिस जी

सभी शेर लाज़वाब हैं , लेकिन थोडी मायूसी क्यूँ है
दो दोस्त भी मिलकर बैठे ऐसा सौभाग्य कहाँ बन पाता है
आप को व आपकी सादगी को नमन है !!!

manu ने कहा…

कमेन्ट देने आया था..
पर सुरूर फिर से छा गया,,,

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

muflis saheb ..


badhai ......आपसी वो कसक अब कहाँ
बस बहाने बहाने हुए.....lawjaawb....याद ने भी किनारा किया, ज़ख्म भी अब पुराने हुए................behatreen....and finally......शौक़ दिल के पुराने हुए,हम भी गुज़रे ज़माने हुए....amazing......

bus badhai ,badhai ,badhai aur kuch nahi .. itna behatreen aur dil ko choone waali gazal sirf aap hi likh sakte ho huzoor ...

well.. is baat ka dukh hamesha rahenga ki aapne hame baithak me nahi bulaya....

anyway ..there is always a tomorrow.....



.

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

aapki ghazal to hamesha hi vyakaran ke lihaz se "Perfect" hoti hai lekin aapki post ko "behar" main lane main pasine choot jate hain.
{2398}

(ab Harkarit ji 2398 ka arth poochangi...
hehehehe...)

:)


Huzurrrr...
ab bhi wahi shaam ka nostalgia hai...
puri deja-vu hua chahti hai ye ghazal.

lagta hai shabd ga rahe hain...

mehfil to pehle hi thi..
hum bhi tere diwane hue.

संजीव गौतम ने कहा…

बहुत बढिया भाई जी. पूरी ग़ज़ल ऐसी मिठाई जिसमें हर चीज़ सोलह आने सही-सही मिलाई गयी हो. हमेशा की तरह आनन्दायक

श्रद्धा जैन ने कहा…

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

wah kya baat hai ye sher to bus dil mein bas gaya

hem pandey ने कहा…

हर एक शेर पर दाद देता हूँ. साधुवाद.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बात आई - गई हो गयी
ख़त्म सारे फ़साने हुए

याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

मुफलिस जी
बिना शिरकत किये........ हम ने भी मज़ा ले लिया......... आपकी जानदार ग़ज़ल के सब शेर खिलते हुवे हैं....... लाजवाब

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

मुफ़लिस जी,
आप की रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई।

Manish Kumar ने कहा…

छोटी बहर में भी आपका अंदाज ए बयाँ मन को लुभाता है।

Nirmla Kapila ने कहा…

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हु
लाजवाब बहुत बहुत शुभकामनाये्

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाहवा.... क्या बात है मुफलिस जी... बेहतरीन कहा है आपने..

शोभना चौरे ने कहा…

ब्लागर बंधुओ की काव्य गोष्ठी को और ब्लागर बंधुओ को
बधाई .
आपकी गजल मन को छु गई
शुभकामनाये

Babli ने कहा…

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
इतना ख़ूबसूरत और लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने कि कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए! दिल को छू गई आपकी ये ग़ज़ल! इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

manu ने कहा…

मुफलिस जी,,
आप लिखा ना कीजिये गजल ,,
गाकर पोस्ट पे डाला कीजिये..
जिन्होंने सुन रखा है उन्हें पता है के क्या जादू चलता है

sada ने कहा…

आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए

भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए

मेरे ब्‍लाग में आपके प्रथम आगमन पर आपका,
हार्दिक अभिनन्‍दन, आपकी रचना में उपरोक्‍त पंक्तियां बहुत ही सुन्‍दर हैं, आभार्

manu ने कहा…

तलाश है,,,
एक मेजर की,,,
जो दिल्ली आया ... मुशायरे में हमें पकाया....
सुबह राजा नल की तरह हम दमयंतियों को सोते छोड़ कर निकल लिया...
सुंदर चेहरा ,आकर्षक व्यक्तित्वा,,, भोली मुस्कान ,,, मासूमियत से निहारती आँखें,,,,
(ओल्ड-मोंक का विशेष शौकीन....)
जहां भी किसी को मिले ...सूचित करे..
काफी लोगों का चैन लूट कर फरार है...

सूचित करने वाले को
उचित
धन्यवाद दिया जाएगा...

गौतम राजरिशी ने कहा…

इस ग़ज़ल को उस दिन से सुने जा रहा हूँ...गुनगुनाये जा रहा हूँ....श्रीमति जी परेशान हो चुकी हैं। बकायदा धमकी मिल चुकी है कि ये ग़ज़ल अगर जबान से न उतरी तो वो आपको फोन लगायेंगी....!!!!
"गज़ल-दुष्यंत के बाद{भाग 3}" के पन्नों में सुशोभित इस ग़ज़ल के तो दीवाने हम पहले से ही थे...फिर उस रोज..उस 20 जून की अप्रतिम संध्या में खुद आपके मुख से सुनना और वो भी उस दिलकश अंदाज़ में कि हायsssssss...हम जानते हैं कि हम कितने किस्मत वाले हैं...!!!
मतला सुंदर है, किंतु हम सहमत नहीं मिस्‍रा-ए-सानी से। न!!! no way....आपके दुश्मन हुआ करे गुजरा जमाना...आप हो तो हम हैं गुरूवर!
हर मिस्‍रे के बाद ठहर कर फेंकी गयी आपकी वो मुस्कान अभी तक आखों में बसी है...अहा!!!
चलिये इस ब्लौग-जगत को हम अनुग्र्हित करते हैं जल्द ही आपकी इस नायाब ग़ज़ल को आपकी ही खूबसूरत आवाज़ में सुना कर।

आशिर्वाद बनायें रखें, वर्ना मनु जी का सर्च-वारंट मुझे रूसवा करके छोड़ेगा...!!! :-)

ज्योति सिंह ने कहा…

शौक़ दिल के पुराने हुए
हम भी गुज़रे ज़माने हुए

बात आई - गई हो गयी
ख़त्म सारे फ़साने हुए

आपसी वो कसक अब कहाँ
बस बहाने बहाने हुए

दूरियाँ , और मजबूरियाँ
उम्र भर के खज़ाने हुए

याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए

आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए .
mujhe to poori hi rachana pasand aai kuchh ke baare me kya kahoo .sonchati rahi aur padhati rahi .umda .

awaz do humko ने कहा…

umda bahut umda

~PakKaramu~ ने कहा…

Pak Karamu reading your blog

Vidhu ने कहा…

बात आई - गई हो गयी
ख़त्म सारे फ़साने हुए
men kyaa kahoon ....jo dil se likhtaa hai wohi samajh saktaa hai ..badhai..badhai

'अदा' ने कहा…

सब खुद को आपका दीवाना बताने लगे हैं
कुछ नल थे अब दमयंती नज़र आने लगे हैं
आपकी आवाज़ में जादू है,हमने भी सुन लिया
बताइए कब आप अपनी ग़ज़ल सुनाने लगे हैं ?

आपकी ग़ज़ल...
बस सुभाल अल्लाह...

'अदा' ने कहा…

मेरी बदकिस्मती कि आज मैं पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ, यह मेरी खुशकिस्मती है कि आप मेरे ब्लॉग पर आये और मेरा हौसला बढाया है, आपकी शुभकामनाएं और आर्शीवाद मिला बहुत अच्छा लगा, अभी अभी आपकी आवाज़ से दो-चार हुई हूँ, यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि मैं उस महफ़िल में नहीं थी, आपकी आवाज़ में आपकी ग़ज़ल महक उठी..

raj ने कहा…

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त भी अब सयाने हुए
भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए
boht khoobsurat ahsaas hai.....

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

मुफलिस जी,

आप्से हुई बात ने ही माहौल बना दिया था, पर मैं नही सुन पाया आप सबको यह अफ्सोस सालता रहेगा।

हकीकत में उस रात का जिक्र चाहे गौतम जी, मनु जी, अर्श जी, दर्पण जी या आप करें अपने पेशे पर रंज होता जरूर है, कहाँ शायरी-ओ-सुखन की महफिल और कहाँ मशीनों की जबां.

इस ग़जल के बारे में कुछ और कहना, लिखना बेमानी होगा। हाँ आपसे सुनने की कसक बाकी है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Nirmla Kapila ने कहा…

आपकी गज़ल और आवाज़ और आपकी ढेर सारी तारीफ तो सुन चुकी हूं अर्श से और भी आपकी कई गज़ल पढी इस लायक नहीं कि उन पर कुछ कह सकूँ मगर आपकी कलम को सलाम जरूर कर सकती हूँ बहुत बहुत बधाई

Shama ने कहा…

Aapkee rachnaon pe tippanee karnekee qaabiliyat nahee rakhtee...!

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

http://shama-baagwaanee.blogspot.com

http://shama-kahanee.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

दूरियाँ , और मजबूरियाँ
उम्र भर के खज़ाने हुए
आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए
भूल पाना तो मुमकिन न था
शायरी के बहाने हुए।
वाह्! हर शेर दाद का हकदार है! बेहतरीन..........

भाई मुफलिस जी, पहली बात तो ये है कि कार्यवयस्ता के कारण पिछले एक महीने से नैट से लगभग दूरी ही बनी रही। इसलिए आपके यहाँ दुआ सलाम करने भी नहीं आ सके। अब जाकर थोडा नियमित हुए हैं।
एक बात ओर कि दो महीनों से आपकी ओर से कोई महफिल की कोई सूचना भी नहीं मिल रही। अब बिना सूचना ओर स्थान की जानकारी के भला किस महफिल में जाया जाए।

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

मुफलिस जी ,आप जैसे गुणी व्यक्ति की टिप्पणी बहुत संबल देती है हमें ! भाई गौतम जी के ब्लॉग पर आप की ग़ज़ल ने कल हमारी रात सार्थक कर दी ! आपके स्वर और कलाम की खुमारी अभी भी तारी है!
आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए...........
आपसी वो कसक अब कहाँ
बस बहाने बहाने हुए...
याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए..........किस किस शेर की चर्चा करुँ,यहाँ तो खजाना ही खुला हुआ है ! बहुत खूब !

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए
...बहुत खूब, उम्दा गजल !!!

नवीन शर्मा ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
नवीन शर्मा ने कहा…

मह की बोतल तो आप निकले,
हम तो बस पैमाने हुए......

------------
कभी कभी लिखने पर भी आपकी तारीफ यूं ही मिलती रहे।
मेरी बहुत तमन्ना होती है ऐसी जगह जाने की,
जैसी आपने बयान की है, पर...

इंसानियत मेरे काम आ जाती जरूर,
रूहानियत ना होती गर सीना ताने हुए....
----------
आदर सहित
नवीन

Satish Bedaag ने कहा…

Wah muflis sahab,har nayi rachna mein ek nayi bulandi nazar aa rahi hai !

Allah kare zor-e-qalam aur zyadah !

Satish Bedaag ने कहा…

Wah muflis sahab,har nayi rachna mein ek nayi bulandi nazar aa rahi hai !

Allah kare zor-e-qalam aur zyadah !

BrijmohanShrivastava ने कहा…

गौतम जी की तरह क्या आप भी यह गजल तरन्नुम में उपलब्ध करा सकते हैं

kshama ने कहा…

Itnee behtareen rachnayen hain,ki, meree boltee band hai..kahnewale to kah chuke hain..!

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

'याद ने भी किनारा किया…।'
शानदार!

Satya.... a vagrant ने कहा…

bahut umda . bahut umda