ये है तरक़्क़ी-याफ़्त: इन्सान आजकल
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जो तेरे साथ-साथ चलती है
वो हवा, रुख़ बदल भी सकती है
क्या ख़बर, ये पहेली हस्ती की
कब उलझती है, कब सुलझती है
वक़्त, औ` उसकी तेज़-रफ़्तारी
रेत मुट्ठी से ज्यों फिसलती है
मुस्कुराता है घर का हर कोना
धूप आँगन में जब उतरती है
ज़िन्दगी में है बस यही ख़ूबी
ज़िन्दगी-भर ही साथ चलती है
ज़िक्र कोई, कहीं चले , लेकिन
बात तुम पर ही आ के रूकती है
ग़म, उदासी, घुटन, परेशानी
मेरी इन सबसे खूब जमती है
अश्क लफ़्ज़ों में जब भी ढलते हैं
ज़िन्दगी की ग़ज़ल सँवरती है
नाख़ुदा, ख़ुद हो जब ख़ुदा 'दानिश'
टूटी कश्ती भी पार लगती है
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दाता , नाम कमाई दे
साँसों में सच्चाई दे
दर्द-ओ-ग़म हँसके सह लूँ
हिम्मत को अफ़ज़ाई दे
मेहनत-कश लोगों को तू
मेहनत की भरपाई दे
शोरो-गुल में क़ैद हूँ मैं
थोड़ी-सी तन्हाई दे
चैन मिले जो यूँ उसको
दे , मुझको , रुसवाई दे
मन की इक-इक बात कहूँ
लफ्ज़ों को सुनवाई दे
एक सनम मेरा भी हो
मुख़लिस , या हरजाई , दे
हर दिल में हो नाम तेरा
हर दिल को ज़ेबाई दे
मेरे नेक ख़यालों को
वुसअत औ` गहराई दे
आँगन-आँगन खुशियाँ हों
घर-घर में रा'नाई दे
पल-पल सच्ची राह चुनूँ
'दानिश' को अगुवाई दे
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अफजाई=अफ्जायिश/वृद्धि
मुख्लिस=निश्छल/सद्भावक
ज़ेबाई=श्रृंगार/सजावट
वुस अत =विस्तार/सामर्थ्य
रा`नाई= सुन्दरता/छटा/सौन्दर्य
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