Saturday, July 8, 2017

फ़ुर्सत कहाँ कि ख़ुद से कोई बात कर सके 
ये है तरक़्क़ी-याफ़्त: इन्सान आजकल
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Saturday, December 12, 2015

पाला-पोसा उम्र-भर रक्खा दिल के पास
अब बूढ़े माँ-बाप का वृद्धाश्रम में वास
paala.posaa umr.bhar, rakkha dil ke paas
ab boodhe maa-baap ka vriddhaashram me vaas

Tuesday, October 13, 2015

लोग
जानते हैं तुम्हें
अपने-अपने ईष्ट के नाम से..
करते रहते हैं तुमसे
अपने हर-हर दुःख की बात
इक उम्मीद-सी रहती है उन्हें
कि सुन ली जाती है
उनकी कोई न कोई बात
कभी तो ...
और इसी धुन में
वो ख़ुद को ख़ुद से जुड़ा पाते हैं
ज़िंदा रहते हैं
ज़िन्दगी भर ही ...
हे परमेश्वर !
प्रार्थना है तुमसे
टूटने न पाए उनकी ये आस..
उनका ये विश्वास...
कभी भी . . .!!!

Tuesday, July 7, 2015

--- ग़ज़ल ---

'हाँ' , 'ना' कहना सीखो जी
रौब न सहना , सीखो जी

कुछ अपने, कुछ दूजों के
रंग में रहना, सीखो जी

कल-कल करती नदियों से
पल-पल बहना सीखो जी

छाँव भले ललचाती हो
धूप भी सहना सीखो जी

मीठे बोल, मधुर लहजा
सुन्दर गहना ! सीखो जी

वक़्त की मर्ज़ी के आगे
कुछ-कुछ ढहना सीखो जी

जब कहने को बात न हो
तब चुप रहना सीखो जी

शब्द तो कहते हो "दानिश"
अर्थ भी कहना सीखो जी

Monday, January 19, 2015

ग़ज़ल / GHAZAL


कोई सूरत निकालिये साहिब
ख़ुद को दुनिया में ढालिये साहिब

अस्ल चेहरा छिपा रहे जिसमें
इक नक़ाब ऐसा डालिये साहिब

'वाह' कह कर निभाइए  सबसे
यूँ न कमियाँ निकालिये साहिब

ख़्वाब कोई तो फल ही जाएगा
ख़्वाहिशें ख़ूब पालिए साहिब

मैकदे में भी आपसी झगड़े
छोड़िये, ख़ाक डालिये साहिब

ये ज़बां कौन अब समझता है
आँसुओं को सँभालिए साहिब

जो हक़ीक़त बयां न कर पाए
वो क़लम तोड़ डालिये साहिब

क्या उसूल और क़ाइदा कैसा
काम अपना निकालिये साहिब

मुस्कुराहट में भी नमी, "दानिश"
बात हँस कर न टालिए साहिब  

Wednesday, December 3, 2014

कुछ यादें,
जब साथ रहती हैं
तो दे जाती हैं ज़िंदगी को
दर्द,
चुभन,
इक अनचाहा-सा ख़याल ...
 

और कुछ यादें,
जब साथ रहती हैं
तो भर देती हैं ज़िंदगी में
सलीक़ा,
हिम्मत,
इक मनचाहा-सा अहसास ...
 

ख़ैर ....!
ज़िंदा बना रहता है इन्सान
यादों के साथ बँधे रहने से ..... !!!

Monday, November 24, 2014

ज़िंदगी में ...  आप
ज़िंदगी का बहाना ... आप
ज़िंदगी का सहारा ... आप
ज़िंदगी की वज्ह ... आप
ज़िंदगी का मक़सद ... आप
…   …   .... 
हर घड़ी , हर पल  . . .
मेरे साथ बने रहने के लिए
धन्यवाद  ...
हे ईश्वर  !
आपका  ढेरों ढेरों धन्यवाद   !!!

Thursday, March 8, 2012

कुछ रास्ते, तो मानो बंद गलियों की तरह
रुक-से जाते हैं .... ढूँढना, बस ढूँढना ही
चारा रह जाता है ,,, कभी कभी ....
एक ग़ज़ल हाज़िर करता हूँ ...

ग़ज़ल



जो तेरे साथ-साथ चलती है

वो हवा, रुख़ बदल भी सकती है


क्या ख़बर, ये पहेली हस्ती की

कब उलझती है, कब सुलझती है


वक़्त, औ` उसकी तेज़-रफ़्तारी

रेत मुट्ठी से ज्यों फिसलती है


मुस्कुराता है घर का हर कोना

धूप आँगन में जब उतरती है


ज़िन्दगी में है बस यही ख़ूबी

ज़िन्दगी-भर ही साथ चलती है


ज़िक्र कोई, कहीं चले , लेकिन

बात तुम पर ही आ के रूकती है


ग़म, उदासी, घुटन, परेशानी

मेरी इन सबसे खूब जमती है


अश्क लफ़्ज़ों में जब भी ढलते हैं

ज़िन्दगी की ग़ज़ल सँवरती है


नाख़ुदा, ख़ुद हो जब ख़ुदा 'दानिश'

टूटी कश्ती भी पार लगती है


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Sunday, February 12, 2012

वक़्त और हालात की अपनी अलग चाहतें हैं
मन का बहलना या बुझ जाना,
सब इन्हीं चाहतों के वश में ही रहता है
किसी तरह के भी ख़ालीपन को भरते रहने की कोशिश
करते रहना अहम भी है और ज़रूरी भी .
ख़ैर , एक ग़ज़ल के चंद शेर हाज़िर हैं ......



ग़ज़ल

शौक़ दिल के पुराने हुए
हम भी गुज़रे ज़माने हुए

बात, आई-गई हो गई
ख़त्म सारे फ़साने हुए

आपसी वो कसक अब कहाँ
बस बहाने , बहाने हुए

दूरियाँ और मजबूरियाँ
उम्र-भर के ख़ज़ाने हुए

आँख ज्यों डबडबाई मेरी
सारे मंज़र सुहाने हुए

याद ने भी किनारा किया
ज़ख्म भी अब पुराने हुए

दिल में है जो, वो लब पर नहीं
दोस्त सारे सयाने हुए

भूल पाना तो मुमकिन न था
शाइरी के बहाने हुए

ख़ैर , 'दानिश' तुम्हे क्या हुआ
क्यूँ अलग अब ठिकाने हुए

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Saturday, January 7, 2012

मौसम का दबदबा क़ाइम है ... सर्दी पूरे शबाब पर है
सूर्य देव के दीदार भी नहीं हो पा रहे हैं,, और सुबह शाम की
धुंद और घने कोहरे से हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता
बस हैं तो जगह-जगह छोटे-बड़े अलाव,, थोड़ी-थोड़ी मूंगफली,,
गुड वाली गचक...और आपके लिए... ग़ज़ल के कुछ शेर.... !!


ग़ज़ल

ज़रा-ज़रा-सी बात पे वो झूट बोलता तो है
उसी का एतबार बार-बार कर लिया तो है

फ़ज़ा-फ़ज़ा महक गयी, समाँ बहक गया तो है
क़रीब आके, गुनगुना के, उसने कुछ कहा तो है

भला नहीं, बुरा सही, ख़याल में उसी के हूँ
शिकायतों में ही सही मुझे वो सोचता तो है

घिरी हैं जो भँवर में, वो भी पार होंगीं कश्तियाँ
यक़ीन-ए-नाख़ुदा नहीं , नवाज़िश-ए-ख़ुदा तो है

गया जहाँ कहीं भी वो, भुला सका न घर कभी
तलाश-ए-रोज़गार में वो दर-ब-दर फिरा तो है

सिमट चुका है आज हर बशर बस अपने आप में
कि जज़्ब-ए-दुआ-ओ-ख़ैर आज घट गया तो है

ख़ला तलाशने की आज हो रही हैं कोशिशें
हयात-ए-बदगुमान का सुराग़-सा मिला तो है

अदब-शनास, रुशनास 'दानिश'-ए-अज़ीम तू
ख़ुदा भला करे तेरा , तू ख़ुद से आशना तो है

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फ़ज़ा=वातावरण/चौतरफा
यक़ीन-ए-नाख़ुदा=नाविक का भरोसा
नवाज़िश-ए-खुदा=भगवान् कि कृपा
ख़ला=अन्तरिक्ष
हयात-ए-बदगुमान=संदिग्ध जीवन/जीवन के आसार
जज़्ब-ए-दुआ-ओ-ख़ैर=भलाई और नेकी की भावनाएं
अदब-शनास=साहित्य का ज्ञाता
रुशनास=परिचित/वाक़िफ़
अज़ीम=महान
आशना=परिचित
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Saturday, December 31, 2011

नई दस्तक, नए आसार ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार ओ साथी
नया साल आए, तो ऐसा ही अब आए
मने, हर दिल में ही त्यौहार ओ साथी

सभी साथियों को
नव वर्ष - २०१२ के लिए
ढेरों शुभकामनाएँ

दुआ है, कि आने वाला ये साल
आप सब के लिए
नई उम्मीदें
नए रास्ते
नई मंज़िलें
नई सफलताएँ लेकर आए...
आप सब खुश रहें ,
खुशहाल रहें
और...अपनी साहित्यिक रुचियों के साथ
यूं ही बने रहें,,जुड़े रहें
आमीन !!

"दानिश"
(डी के सचदेवा)

Wednesday, December 14, 2011

जीवन में निरंतरता, जीवन की ही द्योतक है, जीवन का ही पर्याय है
प्रत्येक प्रकार की रचना-प्रक्रिया इसीलिए ही संभव हो पाती है
लेकिन रचनात्मकता का प्रभाव, विराम के क्षणों में भी
रहता है....-विराम या विश्राम के पलों का अपना महत्त्व है .
और अब....

शब्दों का एक जुड़ाव-सा हुआ है, प्रस्तुत करा रहा हूँ ...



बस, इतना तो है ही


यूं ही कहीं
तनहाई के किन्हीं खाली पलों में
ख़यालात के कोरे पन्नों पर
जब
खिंचने लगें
कुछ आड़ी-तिरछी सी लक़ीरें
बुन-सा जाए
यादों का इक ताना-बाना
रचने लगे
इक अपनी-सी दुनिया

.... ......
फिर वह सब ...
कोई कविता , गीत , ग़ज़ल
हो न हो...
बस इतना तो है ही
ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .

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Tuesday, November 29, 2011

पल-पल , छिन-छिन सरकते सरकते जाने कब
बड़े लम्हों में तब्दील हो जाते हैं ... अहसास तब होता है
जब यूँ लगने लगता है कि वक़्त का एक बड़ा हिस्सा
आने वाले वक़्त के एक और हिस्से को सामने लाने के लिये
हमसे विदा ले चुका है .... लीजिये एक ग़ज़ल हाज़िर करता हूँ ।



ग़ज़ल


माना , कि मुश्किलें हैं , रहे-ख़ारदार में
बदलेगा वक़्त , गुल भी खिलेंगे बहार में

यादों में तेरी , फिर भी , उलझना पसंद है
उलझी तो है हयात, ग़म--रोज़गार
में

इंसान को जाने है ख़ुद पर ग़ुरूर
क्यूँ
है ज़िन्दगी , मौत ही जब इख़्तियार में

मानो , तो सब है बस में , मानो, तो कुछ नहीं
इतना-सा ही तो फ़र्क़ है बस जीत-हार में

चाहत , यक़ीन , फ़र्ज़ , वफ़ा , प्यार , दोस्ती
कल रात कह गया था मैं, क्या-क्या, ख़ुमार
में

नफ़रत के ज़ोर पर तो किसी को कुछ मिला
पा लेता है बशर तो, ख़ुदा को भी प्यार
में

तय की गई थीं जिन पे घरों की
हिफाज़तें
शामिल रहे थे लोग वही , लूट-मार
में

और आज़माओ मुझको अभी , मेरी हसरतो
बाक़ी बहुत जगह है दिल--दाग़दार
में

"दानिश" अब उनसे कह दो, आएँ वो आज
भी
मिलने लगा है मुझको सुकूँ, इन्तज़ार में




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रहे-खारदार = कंटीली राह
हयात = ज़िन्दगी
ग़म ए रोज़गार = दुनियावी उलझने/कामकाज की चिंता
इख्तियार में = बस में/क़ाबू में
दिल ए दागदार = क़ुसूरवार/बदनाम दिल
सुकूँ = आनंद
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Thursday, November 3, 2011

नमस्कार
परिस्थितियों की रुकावटें मन की ख्वाहिशों पर
हमेशा भारी रहती हैं . कुछ ऐसी मजबूरियाँ/मुश्किलें रहीं
कि पिछले दो-तीन माह से मैं आप सब साहित्यकार मित्रों के
ब्लॉग पर उपस्थित न हो पाया . इस बात के लिए मैं आप सबसे
क्षमा चाहता हूँ ... आप सबकी आमद मेरे लिए हमेशा ही
प्रेरणा और उत्साहवर्द्धन का स्रोत रही है , जिसके लिए
धन्यवाद कहना मात्र एक औपचारिकता पूरी करने जैसा ही होगा .
लीजिये एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर-ए-ख़िदमत हूँ ........





ग़ज़ल



बात रखिए , तो ख़ूबतर रखिए
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ कुछ हुनर रखिए

आसमानों तलक नज़र रखिए
और ख़्वाबों को हमसफ़र रखिए

जो भी करना है, कर गुज़रना है
यूँ न दिल में अगर-मगर रखिए

कीजिये आस के दिये रौशन
आँधियों पर भी कुछ नज़र रखिए

जो फ़ना कर दे मुस्कराहट को
उस उदासी को ताक़ पर रखिए

मौत ही ज़िन्दगी का आख़िर है
क्यूँ भला दिल में कोई डर रखिए

दिल में भी ताज़गी हो फूलों की
ज़हन भी खुशबुओं से तर रखिए

ज़िन्दगी तो ख़ुदा की नेमत है
चाह जीने की उम्र-भर रखिए

खोए रहिये न ख़ुद-तलक "दानिश"
कुछ ज़माने की भी ख़बर रखिए


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Wednesday, October 5, 2011

नमस्कार
पिछले माह राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किये गये
हिंदी-दिवस समारोह के सिलसिले में
श्रीनाथद्वारा , उदयपुर (राजस्थान) जाने का अवसर प्राप्त हुआ
देश के विभिन्न प्रान्तों से साहित्यकारों, समआलोचकों, ग़ज़लकारों ,
पत्रकारों इत्यादि ने अपने अनुपम और उपयोगी विचारों से
सभी साहित्य प्रेमियों के ज्ञान में अपार वृद्धि की.
साहित्य-मंडल, नाथद्वारा और हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग द्वारा
कुछ प्रमुख साहित्यकारों को पुरस्कृत अलंकृत भी किया गया .
लेकिन क्या यह सम्मान अपना उचित सम्मान पा भी रहे हैं ...
कुछ ऐसी ही दशा इस काव्य में ..........



आख़िर . . .


आखिर....
बता ही दिया गया उसे
कि यह सब ठीक नहीं
बेकार ही है यह सब
सो ,
उतरवा दिए जाने चाहियें
दीवारों पर सजे सब सम्मान-पत्र
हटा दीं जानी चाहियें
शेल्फ में रक्खीं विभिन्न ट्राफियाँ
समेट दिए जाने चाहियें
ड्राईंग रूम में लटकते कुछ अलंकार-मैडल
रख दिए जाने चाहियें कहीं और ही
टेबुल पर बिखरे कुछ साहित्य नुमा पन्नें ...
.... .... ............
आवाज़ें , ज़ोर पकडती रहीं
आँखें , निरीह तकती रहीं
और
कुछ उपयोगी दिमाग़
बस इतना बुदबुदा ,
शांत हो गए ...
"आख़िर,, बच गया घर ,
..... इक अजायब-घर होने से"


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Sunday, September 4, 2011

खामोशी की तो कोई मुद्दत नही होती...जब आती है
तो घने कोहरे की तरह ज़हनो-दिल को ढके रहती है....
कुछ पल, कुछ लम्हें, कुछ रोज़....
कभी, दिल में उठी ख्वाहिशों को दिमाग, हकीक़त का आइना दिखा कर चुप करवा देता है,
तो कभी दिमाग की ज़िद के आगे दिल की बेबसी साफ़ नज़र आती है.......
ऐसे में खामोश रहना जरुरत भी बन जाता है, और मजबूरी भी.....



ग़ज़ल



हर क़दम पर बिछी है ख़ामोशी
रूह तक जा बसी है ख़ामोशी

ज़िन्दगी की तवील राहों में
फ़र्ज़ की बेबसी है
ख़ामोशी

मैं तो लफ्जों की भीड़ में गुम हूँ
औ` मुझे ढूँढती है ख़ामोशी

हो गया हूँ क़रीबतर ख़ुद से
जब से मुझको मिली है ख़ामोशी

बात दिल की पहुँच गई दिल तक
काम कुछ कर गई है ख़ामोशी

राज़े - दिल अब इसी से कहता हूँ
दोस्त बन कर मिली है
ख़ामोशी

आरिफ़ाना कलाम
होती है
जब कभी बोलती है ख़ामोशी

वक़्त पर काम आ गई आख़िर
देख , कितनी भली है
ख़ामोशी

क्यूं मेरा इम्तेहान लेती है
मुझ में क्या ढूँढती है
ख़ामोशी

दिन की उलझन से हार कर 'दानिश'
रात-भर जागती है ख़ामोशी


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तवील=लम्बी
औ`= और
आरिफ़ाना कलाम=ब्रहम सन्देश
करीबतर=ज्यादा समीप
_____________________________________

Wednesday, July 27, 2011

कुछ एक बातों का दोहरा दिया जाना,
खामोशी के किन्हीं ज़्यादा खिंच गए पलों को
कम करने में कारगर साबित होता है ...
कुछ कहने से, कुछ कह दिया गया कहते रहना ,
आपको अपनी मौजूदगी का अहसास दिला ही जाता
है...
फेस बुक पर छपी एक ग़ज़ल यहाँ भी हाज़िर है,,,
आप इसे ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं !!




ग़ज़ल


दाता , नाम कमाई दे

साँसों में सच्चाई दे


दर्द--ग़म हँसके सह लूँ

हिम्मत को अफ़ज़ाई दे


मेहनत-कश लोगों को तू

मेहनत की भरपाई दे


शोरो-गुल में क़ैद हूँ मैं

थोड़ी-सी तन्हाई दे


चैन मिले जो यूँ उसको

दे , मुझको , रुसवाई दे


मन की इक-इक बात कहूँ

लफ्ज़ों को सुनवाई दे


एक सनम मेरा भी हो

मुख़लिस , या हरजाई , दे


हर दिल में हो नाम तेरा

हर दिल को ज़ेबाई दे


मेरे नेक ख़यालों को

वुसअत ` गहराई दे


आँगन-आँगन खुशियाँ हों

घर-घर में रा'नाई दे


पल-पल सच्ची राह चुनूँ

'दानिश' को अगुवाई दे


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अफजाई=अफ्जायिश/वृद्धि

मुख्लिस=निश्छल/सद्भावक

ज़ेबाई=श्रृंगार/सजावट

वुस अत =विस्तार/सामर्थ्य

रा`नाई= सुन्दरता/छटा/सौन्दर्य

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Saturday, July 9, 2011

मन के भावों को शब्दों के हवाले किये जाने तक की
कशमकश में खुद से रुबरु होना तो तय होता ही है ,
अपने आस-पास को भी खुद तक ला पाने का काम
कर लेना
भी लाज़िम होता रहे तो इक लय बनी रहती है
कुछ, जाने-पहचाने-से
अश`आर, ग़ज़ल की शक्ल में
हाज़िर हैं ......



ग़ज़ल


रहे क़ायम, जहाँ में प्यार , प्यारे
फले - फूले ये कारोबार प्यारे

सुकून-औ-चैन की ही खुशबुएँ हों
सदा खिलता रहे गुलज़ार प्यारे

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से
सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे

लहू का रंग सबका एक-सा है
तो फिर आपस में क्यूँ तकरार प्यारे

महोब्बत की तड़प में भी मज़ा है
सुकूँ देता है ये आज़ार प्यारे

किसी को क्या पड़ी, सोचे किसी को
सभी अपने लिए बीमार, प्यारे

तुम्हें जी-भरके अपना प्यार देगी
करो तो, ज़िन्दगी से प्यार, प्यारे

यही है फलसफा-ए-इश्क़ , 'दानिश',
जो डूबा है, वही है पार, प्यारे


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गुलज़ार=बग़ीचा
शुऊरएज़िन्दगी= जीने का सलीक़ा
तस्लीम=स्वीकार
आज़ार= रोग
फलसफा=सिद्धांत, दर्शन

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Sunday, June 19, 2011

प्रकृति के क़रीब होना, अपने-आप के क़रीब होना ही है
क़ुदरत खिलखिलाती है मानो ज़िन्दगी खिलखिलाती है

खुले आसमान में आज़ादी से उड़ते परिंदे हर बार
अपनी मासूम ज़बान में किसी ना किसी

रूप में कोई ना कोई अच्छा पैग़ाम दे ही जाते हैं....
ख़ैर,,, एक नज़्म हाज़िर--ख़िदमत है .........





नन्ही चिड़िया



रोज़ सुबह
भोर के उजले पहर में
सूरज की मासूम किरणों सँग
मेरे घर की तन्हा मुंडेर पर
वक्त की पाबंदी
और
फ़र्ज़ की बंदिशों से बेख़बर
इक नन्ही-सी चिड़िया
यहाँ-वहाँ बिखरा
दाना-दुनका चुगती
उडती ,
फुदकती ,
चहचहाती है
शुक्र अल्लाह !!
आज ऐसी भीड़ में भी
ज़िन्दगी...
कुछ पल ही सही
हँसती ,
खेलती ,
मुस्कराती है ...



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Tuesday, May 31, 2011

कई बार, ज़हन में समाई कुछ पुरानीयादें
और कागज़ के किन्हीं टुकड़ों पर लिखी रह गईं कुछ तहरीरें
अचानक आवाज़ देने लगतीं हैं...बिसरी यादों पर भले ही

कोई बस चल पाए,, लेकिन कुछ लिखतें तो क़ाबू में ही

जाती हैं... एक पुरानी ग़ज़ल, जिसके कुछ शेर आप पहले भी

पढ़ चुके होंगे,,, कुछ तरमीम /संशोधन के बाद फिर से आपसे

साँझा कर रहा
हूँ... ... ... ...




ग़ज़ल


हर मुखौटे के तले एक मुखौटा निकला
अब तो हर शख्स के चेहरे ही पे चेहरा निकला

आज़माईश तो ग़लत- फ़हमी बढ़ा देती है
इम्तिहानों का तो कुछ और नतीजा निकला

दिल तलक जाने का रस्ता भी तो निकला दिल से
वो शिकायत तो फ़क़त एक बहाना निकला

कोई सरहद न कभी रोक सकी रिश्तों को
ख़ुशबुओं पर, न कभी कोई भी पहरा निकला

रोज़ सड़कों पे गरजती हुई दहशत-गर्दी
रोज़, हर रोज़ शराफ़त का जनाज़ा निकला


तू सितम करने में माहिर, मैं सितम सहने में
ज़िन्दगी ! तुझसे तो रिश्ता मेरा गहरा निकला

यूँ तो काँधों पे वो इक भीड़ लिये फिरता है
ग़ौर से देखा, तो हर शख्स ही तनहा निकला

रंग कोई है ज़माने का, दुनियादारी
लोग सब हँसते हैं, 'दानिश' तू भला क्या निकला


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