Saturday, May 9, 2009

इधर-उधर की भाग-दौड़ , अफरा-तफरी , और कुछ मुश्किलों में
घिरे रहने के बाद अचानक याद आया कि कुछ लिखना भी तो है ,,
सो ....कोई लम्बी भूमिका नही, बस कुछ सरल-सीधे-से लफ्ज़
एक ग़ज़ल की शक़्ल में हाज़िर करता हूँ


ग़ज़ल


बारहा कयूं उलझती रही ज़िन्दगी
उम्र भर मुझ से लड़ती रही ज़िन्दगी

बालपन से जवानी , बुढापे तलक
नाम अपने बदलती रही ज़िन्दगी

याद की तितलियाँ रक़्स करती रहीं
फूल बन कर महकती रही ज़िन्दगी

लाख तूफ़ान आयें , उठें ज़लज़ले
काम चलना है , चलती रही ज़िन्दगी

एक छूटा बदन , दूसरा मिल गया
सिर्फ़ पैकर बदलती रही ज़िन्दगी

घर के आँगन में नन्ही-सी किलकारियां
मन के झूले में पलती रही ज़िन्दगी

कोख अपनी ही माँ की, बनी कत्लगाह
जन्म से पहले मरती रही ज़िन्दगी

इसको जब भी कहीं कोई 'दानिश' मिला
अपने तेवर बदलती रही ज़िन्दगी

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बारहा= बार-बार
रक्स =नृत्य
ज़लज़ला= भूचाल
पैकर= आकृति , शरीर
कत्लगाह=वध-स्थल



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Wednesday, April 22, 2009

नमस्कार
कविताएँ आप ने पढीं , पसंद फरमाईं ....शुक्रिया !
आप सब मुझ से बेहतर जानते हैं कि कविता लिखना या
ग़ज़ल कहना मन में कहीं गहरे उतर कर ख़ुद से बात करना है ।
मैं जब आप जैसे क़ाबिल दोस्तों के ब्लॉग पर जा कर आपकी
उम्दा रचनाएं पढता हूँ तो मुझे उतना ही सुकून मिलता है ,
जितना किसी रचनाकार को अपनी रचना प्रक्रिया के वक्त मिलता
है ...आपकी कविताएँ , आलेख , ग़ज़लें पढ़ना हमेशा-हमेशा एक
अनुभव रहता है , नई ऊर्जा नई प्रेरणा मिलती है ........
लीजिये ! एक छोटी बहर की नन्ही-सी ग़ज़ल हाज़िरे खिदमत है ।


ग़ज़ल


हादिसों के साथ चलना है
ठोकरें खा कर संभलना है

मुश्किलों की आग में तप कर
दर्द के सांचों में ढलना है

हों अगर कांटे भी राहों में
हर घडी बे-खौफ चलना है

जो अंधेरों को निगल जाए
बन के ऐसा दीप जलना है

वक़्त की जो क़द्र भूले, तो
जिंदगी भर हाथ मलना है

हासिले-परवाज़ हो आसाँ
रुख हवाओं का बदलना है

इन्तेहा-ए-आरजू बन कर
आप के दिल में मचलना है

जिंदगी से दोस्ती कर लो
दूर तक जो साथ चलना है

रात भर तू चाँद बन 'दानिश'
सुब्ह सूरज-सा निकलना है ।



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Thursday, April 9, 2009

मुमकिन है कि आप सब विद्वान् रचनाकार , लेखक , अदब-नवाज़ दोस्त
यहाँ दस्तक दे कर कई बार वापिस चले जाते होंगे ....

अब खज़ाना कम है तो है ....मुफलिस हूँ... तो हूँ......
लेकिन एक वजह ये भी है कि कंप्यूटर पर बहुत कम बैठ पाता हूँ....
पिछली बार की कविता के बाद मन में फिर
जिद पनप उठी है कि एक कविता और आपकी खिदमत में पेश
करुँ....हो सकता है कहीं कुछ कम भी हो...लेकिन जब आप हैं तो
हौसला
हो ही जाता है । .......



कविता


कुछ कम तो है .....

आज भी
रात के इस चुभते-से पहर में
अधलेटा-सा...... वह....
अपना बाज़ू अपने माथे पर टिकाए
फिर सोच रहा है ...
कुछ कम तो है कहीं ....
कहीं कुछ घट-सा गया है....
जिसे तलाशने की कोशिश
आज भी की थी उसने.....
दरवाजों पर लटकी बड़ी-बड़ी बेमाअना सी
झालरों के निष्प्राण रंगों में..
यहाँ वहाँ सजावट के लिए रक्खे
मंहगे-मंहगे बनावटी फूलों में..
एक-दम तीखे, शोख़ रंग-रोगन की ओट में
अपना खुरदरापन छिपाए हुए
बेजान दीवारों में...
इस कोने से उस कोने तक फैली-पसरी
खामोशी की बेजान परतों के आसपास..
और..... अपने-आप में ही सिमटे हुए
वैभव, आधुनिकता, और आडम्बर को ओढे
चलते-फिरते कुछ जिस्मों की हलचल में .....
क्या..... ?
क्या.... ? ?
इस घर से गुम हो चुके
एहसास और भावनाएं
अब इस मकान में वह कभी ढूँढ भी पायेगा भला ...?
सोचता है ....
फिर सोचता है.....
और फिर......... ...
रोज़ की तरह कर्वट बदल कर
सो जाने का बहाना करने लगता है .............




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Saturday, March 28, 2009

कभी कभी मन की सोच उड़ान भरने के प्रयास में
विफल-सी हो जाती है ...आपाधापी की इस दौड़ में
कई बार असहजता का आभास होने लगता है । कहीं तो
सन्दर्भ नही मिल पाते , कहीं समीकरण उलझे हुए
मिलते हैं । कहीं कोई व्यथित मन संवाद-हीनता का
दंश झेलता है , कहीं कुछ कुंठा-ग्रस्त भावनाएं
कोहराम की स्थिति बना देती हैं .....


आज ग़ज़ल की जगह एक कविता लेकर हाज़िर हो
रहा हूँ । बस ! हृदयोदगार है, बाक़ी सब आप पर छोड़ता हूँ । ।



कविता

कैसी कैसी बंदिशों में पल रहा है आदमी
जल रहा है , क्यूं निरंतर जल रहा है आदमी


आधुनिकता की चरम सीमा से भी बढ़ता हुआ
भोग की, उपभोग की लपटों से है झुलसा हुआ
फिर भी मन-दर्पण में अपने-आप से सहमा हुआ
वास्तविकता की चुभन, बेकल रहा है आदमी
जल रहा है , क्यूं निरंतर . . . . . . .

कर्म करके सोचता है, अब मिलेंगे दाम क्या ?
पूछता है हर घड़ी , मेरा कहीं है नाम क्या ?
है पता सब को कि होगा आखिरी परिणाम क्या !

जाने फिर क्यूं अब स्वयं को छल रहा है आदमी
जल रहा है , क्यूं निरंतर . . . . . . .

भूल जाओगे अगर पुरखों के तुम उपदेश को
दूर ही करते रहोगे, ख़ुद से इस परिवेश को
क्यूं भला क़ुदरत करेगी माफ़ झूठे वेश को
किस दिशा की ओर जाने चल रहा है आदमी
जल रहा है , क्यूं निरंतर . . . . . . . . . .

कैसी कैसी बंदिशों में पल रहा है आदमी
जल रहा है, क्यूं निरंतर जल रहा है आदमी

Thursday, March 12, 2009

नमस्कार !
आने में कुछ देर हो गई .....वजह जो भी रही हो, अब जो भी कहूँगा
वो एक बहाना ही लगेगा .......
सब से बड़ा दुश्मन ये कंप्यूटर जिसमे 'हिन्दी में काम'
इसी की मर्ज़ी से ही हो पाता है ।
खैर ! एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हूँ .......
आपकी टिप्पणियाँ हमेशा-हमेशा "प्रेरणा" और "प्रोत्साहन" देती रहेंगी ,
इस का विश्वास है मुझे । . . . . . . .


ग़ज़ल

नाम जब भी आ गया उसका ज़बां पर
फिर कहाँ क़ाबू रहा अश्के - रवां पर

आज भी उस मोड़ पर तनहा खडा हूँ
साथ छोड़ा था मेरा तूने जहाँ पर

वक़्त ने मुझ से सवाल ऐसे किए हैं
एक ख़ामोशी लरज़ती है ज़बां पर

माँगना सब के लिए दिल से दुआएं
कौन जाने , कौन मिल जाए कहाँ पर

दर-हकीक़त दर्द से रिश्ता निभाया
कर लिया दिल ने यकीं जब भी गुमां पर

बर्क़ ! तू लहरा ! ज़रा तो रौशनी दे
क्यूँ नज़र रहती तेरी है आशियाँ पर

कामयाबी अब उसे मिल कर रहेगी
वो नज़र रक्खे हुए है आसमाँ पर

बागबाँ करते हैं ख़ुद कलियों का सौदा
वक़्त कैसा आ पड़ा है गुलसितां पर

मैकशी भी अब दगा देने लगी है
ये सितम इक और जाने-नातवाँ पर

बे-अदब , बे-रब्त , कोई सरफिरा है
तब्सिरा उनका है मेरी दास्ताँ पर

आज फिर इक शख्स सूली पर चढ़ेगा
हैं ख़फ़ा कुछ लोग 'दानिश' के बयाँ पर



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अश्के-रवां= बहते आंसू
बर्क़= आसमानी बिजली
मैकशी=sharaab pina
dagaa=dhokha
जाने-नातवाँ= कमज़ोरजान
बे-अदब=अशिष्ट
बे-रब्त=बे-तुका
तब्सिरा=टिप्पणी
दास्ताँ=कहानी
गुमां=शंका



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Sunday, February 22, 2009

नमस्कार !
एक बार फिर आपसे मुखातिब हूँ ....शुक्रिया के साथ किआप मेरी रचनाएं
पढ़ते हैं , पसंद करते हैं , अपनी टिप्पणियों से मेरी हौसला-अफजाई
करते हैं ...एहसान-मंद हूँ आप सब का । अदब कि दुनिया में आज जाने
कितनी कितनी गजलें कही जा रही हैं । इस में कोई शक नही कि ग़ज़ल
आज कीहर दिल अज़ीज़ विधा बन चुकी है । पुरानी रवायतों को निभाते
हुए ग़ज़ल आज के तल्ख़ माहौल की बातें भी करने लगी है । हुस्नो-इश्क़
विसालो-फिराक़ के इलावा आज के सामाजिक हालात , किसी मज़दूर
की थकन , प्रेरणा , नईरौशनी वगैरा सब तरह की बातें ग़ज़ल में कही जा
रही हैं । इसी के साथ-साथ कुछ लोग ग़ज़ल को हिन्दी-ग़ज़ल और
उर्दू-ग़ज़ल में बांटने की ताक में भी लगे हुए हैं जो अच्छी बात नही है ।
ग़ज़ल तो बस ग़ज़ल है ....इस को किसी ज़बान से बांधना अच्छी बात नही ।
हिन्दी में लिखो तो उर्दू वाले पढ़ते हैं, उर्दू में कहो तो हिन्दी वाले आनंद उठाते हैं
बस देखा तो यही जाता है कि ख्याल क्या है, विषय किस तरह के चुने गये हैं ।
और मेरा तो ये मानना है कि लिपि बदलने से कोई विधा तो नही बदल जाती ...
खैर ! पेशे-खिदमत है एक ग़ज़ल जिसे आज गीतिका, मुक्तिका, तेवरी, इत्यादि
भी कहा जाने लगा है .............


ग़ज़ल

मन में संकल्प लिए पाँव बढ़ाओ तो सही
फल भी मिल जाएगा तुम फ़र्ज़ निभाओ तो सही

सत्य की खोज है तो साथ चलेंगी राहें
दिल की दुनिया में कोई दीप जलाओ तो सही

चाँद पर पाके विजय, माना , सजा ली दुनिया
ज़िन्दगी तुम किसी इन्सां की सजाओ तो सही

दुश्मनी करना तो आसान है दुनिया वालो
बात तब है कि कोई दोस्त बनाओ तो सही

ये जो जीवन है, बहुमूल्य खज़ाना है , सुनो
खर्च भी लेना इसे, पहले कमाओ तो सही

क्यूं इधर और उधर खोज रहे हो उसको
मन के भीतर है वो, तुम सर को झुकाओ तो सही

दूसरों को ही नसीहत जो सदा करते हो
चाहते हो जो, वो ख़ुद कर के दिखाओ तो सही

देर तक आज ग़ज़ल बात करेगी तुमसे
लफ्ज़-दर-लफ्ज़ ज़रा पढ़ के सुनाओ तो सही

दौड़ की होड़ में इंसान भटक बैठा है
आज तहज़ीब कहीं गुम है, बचाओ तो सही

अब कभी दूर न जायेगा किसी भी दिल से
कोशिशें कर भी लो, 'दानिश' को भुलाओ तो सही




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Thursday, February 5, 2009

सभी दोस्तों को सलाम ........!
कुछ अर्सा पहले अंशु प्रकाशन दिल्ली की तरफ़ से
मशहूरो मारूफ़ ग़ज़लकार, एक आलिम फ़ाज़िल शख्सियत
उस्तादे-मोहतरम जनाब 'दरवेश' भारती जी कुशल सम्पादन में
एक नायाब पत्रिका "ग़ज़ल के बहाने" मंज़रे-आम पर आई ....
ग़ज़ल में रूचि रखने वालों के लिए ये रिसाला एक एहम दस्तावेज़
साबित हो रहा है । इस अनूठी पत्रिका में आपके 'मुफलिस' की भी
एक रचना शामिल की गई , सो आज वही ग़ज़ल मैं आप सब
दोस्तों की खिदमत में लेकर हाज़िर हो रहा हूँ .....
उम्मीद है पसंद फरमाएंगे .................................
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ग़ज़ल

वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी
ज़िन्दगी, जैसी मिली, अच्छी लगी

बोझ जो दिल पर था, घुल कर बह गया
आंसुओं की ये नदी अच्छी लगी

चांदनी का लुत्फ़ भी तब मिल सका
जब चमकती धूप भी अच्छी लगी

जाग उट्ठी ख़ुद से मिलने की लगन
आज अपनी बेखुदी अच्छी लगी

दोस्तों की बेनियाज़ी देख कर
दुश्मनों की बेरुखी अच्छी लगी

आ गया अब जूझना हालात से
वक़्त की पेचीदगी अच्छी लगी

ज़हन में 'दानिश' उजाला छा गया
इल्मो-फ़न की रौशनी अच्छी लगी

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