नव वर्ष - २०११ का आगमन है
दिल की गहराईयों से भगवान् जी से प्रार्थना है
कि आने वाला साल आप सब के लिये
ढेरों ढेरों खुशियाँ लेकर आये ....
दुनिया में इंसानियत का परचम हमेशा बलंद रहे ...आमीन ..
दुआओं के लिये अलफ़ाज़ वही... पढ़े / सुने-से .....
नयी दस्तक , नए आसार , ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार , ओ साथी
नया साल आये , तो, ऐसा ही अब आये
मने, हर दिल में इक त्यौहार , ओ साथी
हर इक आँगन में महकें आस के बूटे
सजे ख़ुशबू से हर घर-द्वार , ओ साथी
चलो, नफ़रत का हर जज़्बा मिटा कर हम
मुहोब्बत का करें इज़हार , ओ साथी
करें कोशिश यही, हर ख़्वाब हो पूरा
मिले हर सोच को आकार , ओ साथी
करें 'दानिश' यही अब प्रार्थना मिल कर
चमन अपना रहे गुलज़ार , ओ साथी
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आप सब को नव वर्ष २०११ के लिये ढेरों मंगल कामनाएँ
"दानिश" भारती
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Friday, December 31, 2010
Friday, December 10, 2010
किसी भी तरह से, कोई भूमिका ज़हन में नहीं आ रही है
कुछ 'यूं-ही-सी' व्यस्तताएं , कुछ
एक साहित्यिक पत्रिका "सरस्वती-सुमन" (देहरादून) के
'ग़ज़ल-विशेषांक' के अथिति-सम्पादन का जोखिम भरा कार्य ,,,
बस, ये सब मिल कर ही इम्तेहान लेने पर तुले हैं ...
ख़ैर ,,, आज एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ ....
ग़ज़ल
रहता नहीं है दिल में वो मेहमान आजकल
मेरी तरह, है वो भी परेशान आजकल
ख़ुशबू, गई रुतों की, धड़कती है आज भी
यूं भी महक रहा है ये सुनसान आजकल
फ़ुर्सत कहाँ , कि ख़ुद से कोई बात कर सके
ये है ! तरक्क़ी-याफ़्ता इन्सान आजकल
सच बोलते हो तुम , तो तुम्हे जानता है कौन
हर शख्स की है झूट से पहचान आजकल
तेरी निगाह-ए -मस्त के मुहताज हैं सभी
समझा , कि क्यों है मैकदा वीरान आजकल
वो मेरी ज़िन्दगी से अचानक निकल गया
बदला हुआ है ज़ीस्त का उनवान आजकल
माहौल पुरखतर है, कि बीमार ज़ेहन हैं
गुम है सभी के होटों से मुस्कान आजकल
अपना ज़मीर , अपनी अना बेचने के बाद
हर काम होता जाता है आसान आजकल
मांगेगी ज़िन्दगी , तू यक़ीनन , मुआविज़ा
'दानिश' पे हो रहे हैं जो एहसान आजकल
------------------------------------------------
तरक्क़ी-याफ्ता = उन्नत / विकसित मानव
निगाह-ए-मस्त = मस्त आँखें
ज़ीस्त = ज़िन्दगी / जीवन
उनवान = शीर्षक / उद्देश्य
ज़ेहन = सोच / मानसिकता
अना = स्वाभिमान
मुआविज़ा = क़ीमत / वुसूली
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कुछ 'यूं-ही-सी' व्यस्तताएं , कुछ
एक साहित्यिक पत्रिका "सरस्वती-सुमन" (देहरादून) के
'ग़ज़ल-विशेषांक' के अथिति-सम्पादन का जोखिम भरा कार्य ,,,
बस, ये सब मिल कर ही इम्तेहान लेने पर तुले हैं ...
ख़ैर ,,, आज एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ ....
ग़ज़ल
रहता नहीं है दिल में वो मेहमान आजकल
मेरी तरह, है वो भी परेशान आजकल
ख़ुशबू, गई रुतों की, धड़कती है आज भी
यूं भी महक रहा है ये सुनसान आजकल
फ़ुर्सत कहाँ , कि ख़ुद से कोई बात कर सके
ये है ! तरक्क़ी-याफ़्ता इन्सान आजकल
सच बोलते हो तुम , तो तुम्हे जानता है कौन
हर शख्स की है झूट से पहचान आजकल
तेरी निगाह-ए -मस्त के मुहताज हैं सभी
समझा , कि क्यों है मैकदा वीरान आजकल
वो मेरी ज़िन्दगी से अचानक निकल गया
बदला हुआ है ज़ीस्त का उनवान आजकल
माहौल पुरखतर है, कि बीमार ज़ेहन हैं
गुम है सभी के होटों से मुस्कान आजकल
अपना ज़मीर , अपनी अना बेचने के बाद
हर काम होता जाता है आसान आजकल
मांगेगी ज़िन्दगी , तू यक़ीनन , मुआविज़ा
'दानिश' पे हो रहे हैं जो एहसान आजकल
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तरक्क़ी-याफ्ता = उन्नत / विकसित मानव
निगाह-ए-मस्त = मस्त आँखें
ज़ीस्त = ज़िन्दगी / जीवन
उनवान = शीर्षक / उद्देश्य
ज़ेहन = सोच / मानसिकता
अना = स्वाभिमान
मुआविज़ा = क़ीमत / वुसूली
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Wednesday, November 24, 2010
शेक्सपियर ने कहा था ..."व्हाट इज़ इन द नेम ( नाम में क्या रखा है)"
उनका ये कथन बहुत जल्द एक मुहावरा-सा बन गया,,,
फिर कई सालों बाद स्विटज़रलैंड के किसी रचनाकार से बात करते हुए
विख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने कहा.. "नाम ही में बहुत कुछ रक्खा है"
ये कथ्य बस स्तम्भ-लेख का हिस्सा भर रहा...
गुलज़ार साहब का मानना ये रहा कि "नाम गुम जाएगा...."
और एक ये लोकोक्ति "नाम बड़े और दर्शन छोटे.."
अदाकारा मीना कुमारी (मरहूम) फरमाती थीं ...
"आगाज़ तो होता है,अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता॥"
और जावेद अनवर साहब ने उषा खन्ना के संगीत में रफ़ी जी से गवाया
"तुम भी कुछ अच्छा-सा रख लो अपने दीवाने का नाम..."
और नाम के सिलसिले में मुफ़लिस और दानिश दोनों का ये मानना है
"किरदार अहम् है दुनिया में , ये नाम बदलते रहते हैं..."
आज दानिश को आपके रु.ब.रु करते हुए मैं ये कुछ अलफ़ाज़
आप सब के सुपुर्द करता हूँ .......
उम्र के हर मोड़ पर हमने दिए क्या-क्या जवाब
उम्र भर उसके सवालों की न शिद्दत कम हुई
आज भी चुकता नहीं हो पाया क़र्ज़ा ज़ीस्त का
घट गया है और इक दिन , और मोहलत कम हुई
"दानिश" भारती
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क़र्ज़ा = क़र्ज़
शिद्दत = तीव्रता
जीस्त = ज़िन्दगी
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उनका ये कथन बहुत जल्द एक मुहावरा-सा बन गया,,,
फिर कई सालों बाद स्विटज़रलैंड के किसी रचनाकार से बात करते हुए
विख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने कहा.. "नाम ही में बहुत कुछ रक्खा है"
ये कथ्य बस स्तम्भ-लेख का हिस्सा भर रहा...
गुलज़ार साहब का मानना ये रहा कि "नाम गुम जाएगा...."
और एक ये लोकोक्ति "नाम बड़े और दर्शन छोटे.."
अदाकारा मीना कुमारी (मरहूम) फरमाती थीं ...
"आगाज़ तो होता है,अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता॥"
और जावेद अनवर साहब ने उषा खन्ना के संगीत में रफ़ी जी से गवाया
"तुम भी कुछ अच्छा-सा रख लो अपने दीवाने का नाम..."
और नाम के सिलसिले में मुफ़लिस और दानिश दोनों का ये मानना है
"किरदार अहम् है दुनिया में , ये नाम बदलते रहते हैं..."
आज दानिश को आपके रु.ब.रु करते हुए मैं ये कुछ अलफ़ाज़
आप सब के सुपुर्द करता हूँ .......
उम्र के हर मोड़ पर हमने दिए क्या-क्या जवाब
उम्र भर उसके सवालों की न शिद्दत कम हुई
आज भी चुकता नहीं हो पाया क़र्ज़ा ज़ीस्त का
घट गया है और इक दिन , और मोहलत कम हुई
"दानिश" भारती
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क़र्ज़ा = क़र्ज़
शिद्दत = तीव्रता
जीस्त = ज़िन्दगी
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Wednesday, November 3, 2010
खूबसूरत रंगों , चमकती रौशनियों , और महकते रिश्तों का त्यौहार
'दीपावली' आ पहुंचा है,,, हर तरफ ख़ुशियों की फुहार बरस रही है
घर-बाज़ार, गली-कूचे सजे संवरे से नज़र आते हैं,,,
सब मन-भावन है .... लेकिन कुछ मन.... जो उदास हैं,,,
किन्ही कारणों से मजबूर हैं,,,किसी छोटे या बड़े दुःख में घिरे हैं,,,,
आओ ... इस दीपावली पर उन सब के लिये भी ढेरों ढेरों दुआएं मांगें...
लीजिये, एक नज़्म हाज़िर है .......
चलो , कुछ उनके लिये भी चिराग़ रौशन हों .....
ये रौशनी, ये चमक, ये चहल-पहल हर सू
कि हर तरफ ही गुलो-ख़ुशबुओं के साये हैं
ज़मीं का रंग अलग ही तरह से निखरा है
कि आसमान तलक रंगो-नूर छाये हैं
ख़ुशी से झूम उठेंगे खिले-खिले चेहरे
जलेंगे दीप हर इक सिम्त शादमानी के
करेंगी रक्स ये रंगीनियाँ फ़ज़ाओं में
सितारे गीत सुनाएंगे रात-रानी के
मगर , इक ऐसा भी कोना है, जो अँधेरा है
जहाँ है दीप की आहट, न रौशनी का सुराग़
कुछ-एक ऐसे भी अरमान हैं, जो मुर्दा हैं
जहाँ हमेशा है उम्मीद, इक जलेगा चिराग़
कुछ ऐसे लोग, जो बेबस हैं , कुछ परेशाँ हैं
उदासियों के, या मजबूरियों के मारे हैं
दुखों का बोझ, बुरा वक़्त, खेल क़िस्मत का,
किसी कमी की वजह से जो ख़ुद से हारे हैं
चलो , कि उनके घरों में भी रौशनी झलके
चलो , ये सोचें कि अब प्यार हो, तो सबके लिये
चलो , कुछ उनके लिये भी चराग़ रौशन हों
चलो , दियों का ये त्यौहार हो, तो सबके लिये
'दानिश' भारती
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हर इक सिम्त = हर तरफ , चहुँ और
शादमानी = खुशियाँ , उल्लास
रक्स (raqs) = नृत्य, नाच
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आप सब को दीपावली की ढेरों शुभकामनाएँ
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'दीपावली' आ पहुंचा है,,, हर तरफ ख़ुशियों की फुहार बरस रही है
घर-बाज़ार, गली-कूचे सजे संवरे से नज़र आते हैं,,,
सब मन-भावन है .... लेकिन कुछ मन.... जो उदास हैं,,,
किन्ही कारणों से मजबूर हैं,,,किसी छोटे या बड़े दुःख में घिरे हैं,,,,
आओ ... इस दीपावली पर उन सब के लिये भी ढेरों ढेरों दुआएं मांगें...
लीजिये, एक नज़्म हाज़िर है .......
चलो , कुछ उनके लिये भी चिराग़ रौशन हों .....
ये रौशनी, ये चमक, ये चहल-पहल हर सू
कि हर तरफ ही गुलो-ख़ुशबुओं के साये हैं
ज़मीं का रंग अलग ही तरह से निखरा है
कि आसमान तलक रंगो-नूर छाये हैं
ख़ुशी से झूम उठेंगे खिले-खिले चेहरे
जलेंगे दीप हर इक सिम्त शादमानी के
करेंगी रक्स ये रंगीनियाँ फ़ज़ाओं में
सितारे गीत सुनाएंगे रात-रानी के
मगर , इक ऐसा भी कोना है, जो अँधेरा है
जहाँ है दीप की आहट, न रौशनी का सुराग़
कुछ-एक ऐसे भी अरमान हैं, जो मुर्दा हैं
जहाँ हमेशा है उम्मीद, इक जलेगा चिराग़
कुछ ऐसे लोग, जो बेबस हैं , कुछ परेशाँ हैं
उदासियों के, या मजबूरियों के मारे हैं
दुखों का बोझ, बुरा वक़्त, खेल क़िस्मत का,
किसी कमी की वजह से जो ख़ुद से हारे हैं
चलो , कि उनके घरों में भी रौशनी झलके
चलो , ये सोचें कि अब प्यार हो, तो सबके लिये
चलो , कुछ उनके लिये भी चराग़ रौशन हों
चलो , दियों का ये त्यौहार हो, तो सबके लिये
'दानिश' भारती
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हर इक सिम्त = हर तरफ , चहुँ और
शादमानी = खुशियाँ , उल्लास
रक्स (raqs) = नृत्य, नाच
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आप सब को दीपावली की ढेरों शुभकामनाएँ
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Saturday, October 16, 2010
नमस्कार
पिछली रचना पोस्ट करने की तिथि देख कर, लगने ही लगा
कि दिन बहुत हो गए हैं,,, कुछ नया हो जाना चाहिए...
लेकिन,, जब पोटली में तलाश किया तो खाली-खाली-सी महसूस हुई
गीत याद आने लगा "जो मुराद बन के बरसे,वो दुआ कहाँ से लाऊँ..."
फिर, बैठे-बैठे,, जाने कब,,, कुछ आड़ी-तिरछी-सी रेखाएं खिंच गईं...
और ठान लिया...कि अब जो भी है , यही सुनाना/पढवाना है आपसब को .....
तो... लीजिये...हाज़िर है एक नज़्म ...
मैं कविता में.... मुझ में कविता
मैं , अक्सर ही
अपनी इक बेसुध-सी धुन में
कुछ लम्हों को साथ लिए, जब
अलबेली अनजानी ख़्वाबों की दुनिया में
ख़ुद अपनी ही खोज-ख़बर लेने जाता हूँ
तब, कुछ जानी-पहचानी यादों का जादू
मुझको अपने साथ बहा कर ले जाता है ...
लाख जतन कर लेने पर भी
कुछ पुरसोज़ ख़यालों को, जब,
लफ़्ज़ों से लबरेज़ लिबास नहीं मिल पाता
ज़हन में, पल-पल चुभते, तल्ख़ सवालों का जब
मरहम-सा माकूल, जवाब नहीं मिल पाता
ऐसे में मैं,,
ऐसे में मैं भूल के ख़ुद को
उसको याद किया करता हूँ
अनजानी आहट की राह तका करता हूँ
और अचानक
इक आमद होने लगती है
आड़े-तिरछे लफ़्ज़, लक़ीरें,
ख़ुशख़त-सी तहरीरों में ढलने लगते हैं
कुछ क़तरे, कुछ मुस्कानें, सब,
'इक कविता-सी' हो जाते हैं ...
फिर मैं, और मेरी ये कविता
इक दूजे से, देर तलक बातें करते हैं
काग़ज़ के टुकड़े पर फ़ैली...
वो, मेरे सीने पे सर रख, सो जाती है
मैं भी देर तलक उसको पढता रहता हूँ
हम दोनों ही खो जाते हैं...
मैं कविता में...
मुझ में कविता ....
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पिछली रचना पोस्ट करने की तिथि देख कर, लगने ही लगा
कि दिन बहुत हो गए हैं,,, कुछ नया हो जाना चाहिए...
लेकिन,, जब पोटली में तलाश किया तो खाली-खाली-सी महसूस हुई
गीत याद आने लगा "जो मुराद बन के बरसे,वो दुआ कहाँ से लाऊँ..."
फिर, बैठे-बैठे,, जाने कब,,, कुछ आड़ी-तिरछी-सी रेखाएं खिंच गईं...
और ठान लिया...कि अब जो भी है , यही सुनाना/पढवाना है आपसब को .....
तो... लीजिये...हाज़िर है एक नज़्म ...
मैं कविता में.... मुझ में कविता
मैं , अक्सर ही
अपनी इक बेसुध-सी धुन में
कुछ लम्हों को साथ लिए, जब
अलबेली अनजानी ख़्वाबों की दुनिया में
ख़ुद अपनी ही खोज-ख़बर लेने जाता हूँ
तब, कुछ जानी-पहचानी यादों का जादू
मुझको अपने साथ बहा कर ले जाता है ...
लाख जतन कर लेने पर भी
कुछ पुरसोज़ ख़यालों को, जब,
लफ़्ज़ों से लबरेज़ लिबास नहीं मिल पाता
ज़हन में, पल-पल चुभते, तल्ख़ सवालों का जब
मरहम-सा माकूल, जवाब नहीं मिल पाता
ऐसे में मैं,,
ऐसे में मैं भूल के ख़ुद को
उसको याद किया करता हूँ
अनजानी आहट की राह तका करता हूँ
और अचानक
इक आमद होने लगती है
आड़े-तिरछे लफ़्ज़, लक़ीरें,
ख़ुशख़त-सी तहरीरों में ढलने लगते हैं
कुछ क़तरे, कुछ मुस्कानें, सब,
'इक कविता-सी' हो जाते हैं ...
फिर मैं, और मेरी ये कविता
इक दूजे से, देर तलक बातें करते हैं
काग़ज़ के टुकड़े पर फ़ैली...
वो, मेरे सीने पे सर रख, सो जाती है
मैं भी देर तलक उसको पढता रहता हूँ
हम दोनों ही खो जाते हैं...
मैं कविता में...
मुझ में कविता ....
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Sunday, September 26, 2010
आज जो ग़ज़ल मैं आपसे सांझी करने जा रहा हूँ
उसे आप पहले "आज की ग़ज़ल" ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं
बस मन में आया कि उसी ग़ज़ल को दोहरा लिया जाए...
उम्मीद करता हूँ कि हमेशा की तरह ही
अपनी दुआओं से नवाजेंगे ....
ग़ज़ल
जो सच से ही नज़रें बचा कर चले
समझ लो वो अपना बुरा कर चले
चले, जब भी हम, मुस्कुरा कर चले
हर इक राह में गुल खिला कर चले
हम अपनी यूँ हस्ती मिटा कर चले
मुहव्बत को रूतबा अता कर चले
लबे-बाम हैं वो, मगर हुक़्म है
चले जो यहाँ, सर झुका कर चले
इसे, उम्र भर ही शिकायत रही
बहुत ज़िन्दगी को मना कर चले
वो बादल ज़मीं पर तो बरसे नहीं
समंदर पे सब कुछ लुटा कर चले
चकाचौंध के इस छलावे में हम
खुद अपना ही विरसा भुला कर चले
किताबों में चर्चा उन्हीं की रहा
ज़माने में जो, कुछ नया कर चले
ख़ुदा तो सभी का मददगार है
बशर्ते, बशर इल्तिजा कर चले
कब इस का मैं 'दानिश' भरम तोड़ दूँ
मुझे ज़िन्दगी आज़मा कर चले
____________________________
____________________________
लबे-बाम = अटरिया पर , छत पर ,
अटारी (बालकनी में)
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उसे आप पहले "आज की ग़ज़ल" ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं
बस मन में आया कि उसी ग़ज़ल को दोहरा लिया जाए...
उम्मीद करता हूँ कि हमेशा की तरह ही
अपनी दुआओं से नवाजेंगे ....
ग़ज़ल
जो सच से ही नज़रें बचा कर चले
समझ लो वो अपना बुरा कर चले
चले, जब भी हम, मुस्कुरा कर चले
हर इक राह में गुल खिला कर चले
हम अपनी यूँ हस्ती मिटा कर चले
मुहव्बत को रूतबा अता कर चले
लबे-बाम हैं वो, मगर हुक़्म है
चले जो यहाँ, सर झुका कर चले
इसे, उम्र भर ही शिकायत रही
बहुत ज़िन्दगी को मना कर चले
वो बादल ज़मीं पर तो बरसे नहीं
समंदर पे सब कुछ लुटा कर चले
चकाचौंध के इस छलावे में हम
खुद अपना ही विरसा भुला कर चले
किताबों में चर्चा उन्हीं की रहा
ज़माने में जो, कुछ नया कर चले
ख़ुदा तो सभी का मददगार है
बशर्ते, बशर इल्तिजा कर चले
कब इस का मैं 'दानिश' भरम तोड़ दूँ
मुझे ज़िन्दगी आज़मा कर चले
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लबे-बाम = अटरिया पर , छत पर ,
अटारी (बालकनी में)
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Thursday, September 2, 2010
"तर्ज़े बयाँ" की बनावट ही कुछ ऐसी अधूरी और
अटपटी है किमुझे ब्लॉग-जगत में होती रहने वाली आहटों का
समय रहते पता ही नहीं चल पाता,,, कब किसी
ब्लॉग-मित्र द्वारा कोई रचना डाल दी जाती है, उसकी
खबर मुझे अपने ब्लॉग से नहीं हो पाती ....
अत: मैं सभी साथियों से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मैं
मुनासिब वक्त पर वहाँ हाज़िर नहीं हो पाता हूँ।
ख़ैर एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हुआ हूँ .....
ग़ज़ल
चार:गर का फ़ैसला कुछ और है
दर्द की मेरे , दवा , कुछ और है
शख्स हर पल सोचता कुछ और है
वक्त की लेकिन रज़ा , कुछ और है
मेल - जोल आपस में, होता था कभी
अब ज़माने की हवा कुछ और है
है बहुत मुश्किल भुला देना उसे
लेकिन उसका सोचना कुछ और है
साँस लेना ही फ़क़त , जीना नहीं
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कुछ और है
होती होंगीं पुर-सुकूँ , आसानियाँ
इम्तिहानों का नशा कुछ और है
है तक़ाज़ा, सच को सच कह दें , मगर
मशवरा हालात का , कुछ और है
लफ़्ज़ तू , हर लफ़्ज़ का मानी भी तू
क्या सुख़न, इसके सिवा , कुछ और है?
जाने , कब से ढूँढती है ज़िन्दगी
हो न हो, मेरा पता कुछ और है
जो बशर मालिक की लौ से जुड गया
'दानिश' उसका मर्तबा कुछ और है
_________________________________
_________________________________
चार;गर = चारागर , इलाज करने वाला
रज़ा = मर्ज़ी ,,, पुरसुकून = सुख देने वाली
लफ़्ज़ = शब्द ,,,, मानी = अर्थ
सुख़न = काव्य सृजन
मर्तबा = रूतबा
अटपटी है किमुझे ब्लॉग-जगत में होती रहने वाली आहटों का
समय रहते पता ही नहीं चल पाता,,, कब किसी
ब्लॉग-मित्र द्वारा कोई रचना डाल दी जाती है, उसकी
खबर मुझे अपने ब्लॉग से नहीं हो पाती ....
अत: मैं सभी साथियों से क्षमा प्रार्थी हूँ कि मैं
मुनासिब वक्त पर वहाँ हाज़िर नहीं हो पाता हूँ।
ख़ैर एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हुआ हूँ .....
ग़ज़ल
चार:गर का फ़ैसला कुछ और है
दर्द की मेरे , दवा , कुछ और है
शख्स हर पल सोचता कुछ और है
वक्त की लेकिन रज़ा , कुछ और है
मेल - जोल आपस में, होता था कभी
अब ज़माने की हवा कुछ और है
है बहुत मुश्किल भुला देना उसे
लेकिन उसका सोचना कुछ और है
साँस लेना ही फ़क़त , जीना नहीं
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कुछ और है
होती होंगीं पुर-सुकूँ , आसानियाँ
इम्तिहानों का नशा कुछ और है
है तक़ाज़ा, सच को सच कह दें , मगर
मशवरा हालात का , कुछ और है
लफ़्ज़ तू , हर लफ़्ज़ का मानी भी तू
क्या सुख़न, इसके सिवा , कुछ और है?
जाने , कब से ढूँढती है ज़िन्दगी
हो न हो, मेरा पता कुछ और है
जो बशर मालिक की लौ से जुड गया
'दानिश' उसका मर्तबा कुछ और है
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चार;गर = चारागर , इलाज करने वाला
रज़ा = मर्ज़ी ,,, पुरसुकून = सुख देने वाली
लफ़्ज़ = शब्द ,,,, मानी = अर्थ
सुख़न = काव्य सृजन
मर्तबा = रूतबा
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