रंगों और उमंगों के त्यौहार होली की आमद है
नफ़रत और बैर-भाव बाक़ी ना रहे,, लोगों में अम्नो-अमान
और आपसी भाईचारा बना रहे...इन्ही दुआओं के साथ
आप सब को ढेरों मुबारकबाद ।
ग़ज़ल
जब करें वो , जीत की या हार की बातें करें
लोग, अब तो जंग की , हथियार की बातें करें
क्या ज़रूरी है कि हम तक़रार की बातें करें
आ, कि मिल बैठें कभी, कुछ प्यार की बातें करें
रंग होली के , बसंती राग , बैसाखी का ढोल ,
मौसमों का ज़िक्र हो , त्यौहार की बातें करें
वक़्त है , फुर्सत भी है , मौक़ा भी है , दस्तूर भी
अब चलो, दिल खोल कर दिलदार की बातें करें
ज़िन्दगी के साज़ पर छेड़ें तराने हम नए
गीत की, संगीत की , झंकार की बातें करें
इस बदलते दौर में हम क्यों रहें पीछे भला
वक़्त के साथी बनें , रफ़्तार की बातें करें
अब फ़क़त ये आस, लफ़्ज़ों तक न रह जाए कहीं
ख़्वाब सच्चे हों , इसी आसार की बातें करें
है यही वाजिब कि 'दानिश' ज़िक्र-ए-जन्नत छोड़ कर
हम इसी दुनिया , इसी संसार की बातें करें
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तकरार=झगड़ा
वाजिब=उचित
ज़िक्र-ए-जन्नत= स्वर्ग(काल्पनिक) लोक की चर्चाएं
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Sunday, March 13, 2011
Saturday, February 19, 2011
पिछले दिनों आदरणीय श्री पंकज सुबीर जी केब्लॉग पर
एक तरही मिसरा मश्क़ के लिये दिया गया था,,
"नए साल में नए गुल खिलें, नयी खुशबुएँ नए रंग हों"
मिसरा अपने आप में बहुत अनूठा रहा, मन में समा जाने वाला..
इसी मिसरे को लेकर कुछ शेर हो गये हैं
जो आप सब की खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ.......
ग़ज़ल
हों बुझे-बुझे, कि खिले-खिले, वो बने रहें, या कि भंग हों
तेरी सोच के सभी सिलसिले, तेरे अपने मन की तरंग हों
तेरी ज़िंदगी, हो वो ज़िंदगी, जो किसी के काम भी आ सके
तू बने, तो ऐसा उदाहरण , चहुँ ओर तेरे प्रसंग हों
है पड़ोसी वो, तो भले पड़ोसी का फ़र्ज़ भो तो निभाए वो
न करे कुछ ऐसी वो हरक़तें, जो हमेशा बाईस-ए-जंग हों
यही चाहते हैं सब आजकल , है हवा जिधर की, उधर चलो
न तो ज़िंदगी में हों क़ायदे , न उसूल कोई, न ढंग हों
यूँ फ़रोग़-ए-इल्म के वास्ते, जो कभी भी कोई कहे ग़ज़ल
यही इल्तेजा है मेरे ख़ुदा, न रदीफ़-ओ-क़ाफ़िये तंग हों
मेरे स्वप्न शिल्प में जब ढलें , मेरा शब्द-शब्द सृजन रचे
मिले कल्पना को इक आकृति, भले भाव मन के अनंग हों
चलो 'दानिश' अब ये दुआ करें , हों सभी दिलों में ये ख्वाहिशें
हो कोई भी दुःख, सभी साथ हों, हो कोई ख़ुशी, सभी संग हों
----------------------------------------------------------
प्रसंग=चर्चे/वार्तालाप
बाईस-ए-जंग=युद्ध/झगड़े का कारण
फरोग-ए-इल्म=ज्ञान वृद्धि/विद्या प्रसार
रदीफ़-ओ-क़ाफिये=ग़ज़ल की व्याकरण से सम्बंधित घटक
(तुकांत इत्यादि)
अनंग=देह रहित/बिना श़क्ल
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एक तरही मिसरा मश्क़ के लिये दिया गया था,,
"नए साल में नए गुल खिलें, नयी खुशबुएँ नए रंग हों"
मिसरा अपने आप में बहुत अनूठा रहा, मन में समा जाने वाला..
इसी मिसरे को लेकर कुछ शेर हो गये हैं
जो आप सब की खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ.......
ग़ज़ल
हों बुझे-बुझे, कि खिले-खिले, वो बने रहें, या कि भंग हों
तेरी सोच के सभी सिलसिले, तेरे अपने मन की तरंग हों
तेरी ज़िंदगी, हो वो ज़िंदगी, जो किसी के काम भी आ सके
तू बने, तो ऐसा उदाहरण , चहुँ ओर तेरे प्रसंग हों
है पड़ोसी वो, तो भले पड़ोसी का फ़र्ज़ भो तो निभाए वो
न करे कुछ ऐसी वो हरक़तें, जो हमेशा बाईस-ए-जंग हों
यही चाहते हैं सब आजकल , है हवा जिधर की, उधर चलो
न तो ज़िंदगी में हों क़ायदे , न उसूल कोई, न ढंग हों
यूँ फ़रोग़-ए-इल्म के वास्ते, जो कभी भी कोई कहे ग़ज़ल
यही इल्तेजा है मेरे ख़ुदा, न रदीफ़-ओ-क़ाफ़िये तंग हों
मेरे स्वप्न शिल्प में जब ढलें , मेरा शब्द-शब्द सृजन रचे
मिले कल्पना को इक आकृति, भले भाव मन के अनंग हों
चलो 'दानिश' अब ये दुआ करें , हों सभी दिलों में ये ख्वाहिशें
हो कोई भी दुःख, सभी साथ हों, हो कोई ख़ुशी, सभी संग हों
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प्रसंग=चर्चे/वार्तालाप
बाईस-ए-जंग=युद्ध/झगड़े का कारण
फरोग-ए-इल्म=ज्ञान वृद्धि/विद्या प्रसार
रदीफ़-ओ-क़ाफिये=ग़ज़ल की व्याकरण से सम्बंधित घटक
(तुकांत इत्यादि)
अनंग=देह रहित/बिना श़क्ल
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Tuesday, February 1, 2011
पिछ्ला बहुत सारा वक़्त साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वती-सुमन'
के ग़ज़ल विशेषांक की देख रेख में ही गुज़रा,,,
इस दौरान दोस्तों का सहयोग , शमूलियत और शिकायतें
सब साथ साथ रहे... विशेषांक, अपने पाठकों तक पहुँच रहा है
आप चाहें, तो डॉ आनंद सुमन सिंह (मुख्य सम्पादक) से
०९४१२०-०९००० पर संपर्क करके उसे हासिल कर सकते हैं।
आपकी खिदमत में एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ .....
ग़ज़ल
शिकायत भी, तकल्लुफ़ भी, बहाना भी
मुझे, मन्ज़ूर है उसका सताना भी
मुसलसल इम्तेहाँ , बेचैनियाँ पल-पल
न रास आया हमें दिल का लगाना भी
बिना मतलब मेरी तनक़ीद कर-कर के
मुझे वो चाहता है आज़माना भी
नयापन आज का, माना, ज़रूरी है
सुख़न में चाहिए लहजा पुराना भी
हमेशा हम निभाएं तौर दुनिया के ?
कभी सोचे तो आख़िर कुछ ज़माना भी
यक़ीनन, मैं उसे महसूस करता हूँ
कभी ज़ाहिर, कभी कुछ ग़ायबाना भी
हमेशा ज़िन्दगी से इश्क़ फ़रमाया
मिज़ाज अपना रहा कुछ शायराना भी
बुरा वक़्त आये, तो देना जवाब ऐसे
उदास आँखों से 'दानिश' मुस्कराना भी
------------------------------------------
तकल्लुफ़=औपचारिकता
मुसलसल=लगातार, निरंतर
तनक़ीद=आलोचना, टीका-टिप्पणी
सुख़न=काव्य-प्रक्रिया, वार्ता
तौर=शैली, पद्वति
ज़ाहिर=स्पष्टत:, प्रकट
ग़ायबाना=अस्पष्ट, अनुपस्थित
मिज़ाज=स्वभाव
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के ग़ज़ल विशेषांक की देख रेख में ही गुज़रा,,,
इस दौरान दोस्तों का सहयोग , शमूलियत और शिकायतें
सब साथ साथ रहे... विशेषांक, अपने पाठकों तक पहुँच रहा है
आप चाहें, तो डॉ आनंद सुमन सिंह (मुख्य सम्पादक) से
०९४१२०-०९००० पर संपर्क करके उसे हासिल कर सकते हैं।
आपकी खिदमत में एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ .....
ग़ज़ल
शिकायत भी, तकल्लुफ़ भी, बहाना भी
मुझे, मन्ज़ूर है उसका सताना भी
मुसलसल इम्तेहाँ , बेचैनियाँ पल-पल
न रास आया हमें दिल का लगाना भी
बिना मतलब मेरी तनक़ीद कर-कर के
मुझे वो चाहता है आज़माना भी
नयापन आज का, माना, ज़रूरी है
सुख़न में चाहिए लहजा पुराना भी
हमेशा हम निभाएं तौर दुनिया के ?
कभी सोचे तो आख़िर कुछ ज़माना भी
यक़ीनन, मैं उसे महसूस करता हूँ
कभी ज़ाहिर, कभी कुछ ग़ायबाना भी
हमेशा ज़िन्दगी से इश्क़ फ़रमाया
मिज़ाज अपना रहा कुछ शायराना भी
बुरा वक़्त आये, तो देना जवाब ऐसे
उदास आँखों से 'दानिश' मुस्कराना भी
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तकल्लुफ़=औपचारिकता
मुसलसल=लगातार, निरंतर
तनक़ीद=आलोचना, टीका-टिप्पणी
सुख़न=काव्य-प्रक्रिया, वार्ता
तौर=शैली, पद्वति
ज़ाहिर=स्पष्टत:, प्रकट
ग़ायबाना=अस्पष्ट, अनुपस्थित
मिज़ाज=स्वभाव
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Wednesday, January 12, 2011
शब्द को जब आवाज़ न मिल पाए , तो उसे ख़ामोशी से
लगाव होने लगता है... लेकिन, ख़ामोशी, हमेशा मुनासिब
जान ली जाए,, ये बात भी मुनासिब नहीं जान पड़ती ...
स्वामी विवेकानंद जी के किसी क़ौल को कुछ शब्द
देने की कोशिश करते हुए आप सब से एक छोटी-सी
नज़्म सांझा करना चाहता हूँ ........
विश्वास की डगर
माना,
कि बुरा है
जीवन में ....
किसी भूलवश
'कुछ' खो देना
माना,
कि और भी बुरा है
जीवन में....
किसी अज्ञानतावश
'और भी कुछ' खो देना
लेकिन...
सब से ज़यादा बुरा है
जीवन में,
किसी हताशावश
इस 'कुछ' और 'बहुत कुछ' खोये को
वापिस पा सकने की
उम्मीद को ही खो देना ....
विश्वास की डगर ही
जीवन की डगर है .........
---------------------------------------------
आप सब को लोहरी के त्योहार
और मकर संक्राति की शुभकामनाएं
----------------------------------------------
लगाव होने लगता है... लेकिन, ख़ामोशी, हमेशा मुनासिब
जान ली जाए,, ये बात भी मुनासिब नहीं जान पड़ती ...
स्वामी विवेकानंद जी के किसी क़ौल को कुछ शब्द
देने की कोशिश करते हुए आप सब से एक छोटी-सी
नज़्म सांझा करना चाहता हूँ ........
विश्वास की डगर
माना,
कि बुरा है
जीवन में ....
किसी भूलवश
'कुछ' खो देना
माना,
कि और भी बुरा है
जीवन में....
किसी अज्ञानतावश
'और भी कुछ' खो देना
लेकिन...
सब से ज़यादा बुरा है
जीवन में,
किसी हताशावश
इस 'कुछ' और 'बहुत कुछ' खोये को
वापिस पा सकने की
उम्मीद को ही खो देना ....
विश्वास की डगर ही
जीवन की डगर है .........
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आप सब को लोहरी के त्योहार
और मकर संक्राति की शुभकामनाएं
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Friday, December 31, 2010
नव वर्ष - २०११ का आगमन है
दिल की गहराईयों से भगवान् जी से प्रार्थना है
कि आने वाला साल आप सब के लिये
ढेरों ढेरों खुशियाँ लेकर आये ....
दुनिया में इंसानियत का परचम हमेशा बलंद रहे ...आमीन ..
दुआओं के लिये अलफ़ाज़ वही... पढ़े / सुने-से .....
नयी दस्तक , नए आसार , ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार , ओ साथी
नया साल आये , तो, ऐसा ही अब आये
मने, हर दिल में इक त्यौहार , ओ साथी
हर इक आँगन में महकें आस के बूटे
सजे ख़ुशबू से हर घर-द्वार , ओ साथी
चलो, नफ़रत का हर जज़्बा मिटा कर हम
मुहोब्बत का करें इज़हार , ओ साथी
करें कोशिश यही, हर ख़्वाब हो पूरा
मिले हर सोच को आकार , ओ साथी
करें 'दानिश' यही अब प्रार्थना मिल कर
चमन अपना रहे गुलज़ार , ओ साथी
------------------------------------------------------
आप सब को नव वर्ष २०११ के लिये ढेरों मंगल कामनाएँ
"दानिश" भारती
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दिल की गहराईयों से भगवान् जी से प्रार्थना है
कि आने वाला साल आप सब के लिये
ढेरों ढेरों खुशियाँ लेकर आये ....
दुनिया में इंसानियत का परचम हमेशा बलंद रहे ...आमीन ..
दुआओं के लिये अलफ़ाज़ वही... पढ़े / सुने-से .....
नयी दस्तक , नए आसार , ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार , ओ साथी
नया साल आये , तो, ऐसा ही अब आये
मने, हर दिल में इक त्यौहार , ओ साथी
हर इक आँगन में महकें आस के बूटे
सजे ख़ुशबू से हर घर-द्वार , ओ साथी
चलो, नफ़रत का हर जज़्बा मिटा कर हम
मुहोब्बत का करें इज़हार , ओ साथी
करें कोशिश यही, हर ख़्वाब हो पूरा
मिले हर सोच को आकार , ओ साथी
करें 'दानिश' यही अब प्रार्थना मिल कर
चमन अपना रहे गुलज़ार , ओ साथी
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आप सब को नव वर्ष २०११ के लिये ढेरों मंगल कामनाएँ
"दानिश" भारती
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Friday, December 10, 2010
किसी भी तरह से, कोई भूमिका ज़हन में नहीं आ रही है
कुछ 'यूं-ही-सी' व्यस्तताएं , कुछ
एक साहित्यिक पत्रिका "सरस्वती-सुमन" (देहरादून) के
'ग़ज़ल-विशेषांक' के अथिति-सम्पादन का जोखिम भरा कार्य ,,,
बस, ये सब मिल कर ही इम्तेहान लेने पर तुले हैं ...
ख़ैर ,,, आज एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ ....
ग़ज़ल
रहता नहीं है दिल में वो मेहमान आजकल
मेरी तरह, है वो भी परेशान आजकल
ख़ुशबू, गई रुतों की, धड़कती है आज भी
यूं भी महक रहा है ये सुनसान आजकल
फ़ुर्सत कहाँ , कि ख़ुद से कोई बात कर सके
ये है ! तरक्क़ी-याफ़्ता इन्सान आजकल
सच बोलते हो तुम , तो तुम्हे जानता है कौन
हर शख्स की है झूट से पहचान आजकल
तेरी निगाह-ए -मस्त के मुहताज हैं सभी
समझा , कि क्यों है मैकदा वीरान आजकल
वो मेरी ज़िन्दगी से अचानक निकल गया
बदला हुआ है ज़ीस्त का उनवान आजकल
माहौल पुरखतर है, कि बीमार ज़ेहन हैं
गुम है सभी के होटों से मुस्कान आजकल
अपना ज़मीर , अपनी अना बेचने के बाद
हर काम होता जाता है आसान आजकल
मांगेगी ज़िन्दगी , तू यक़ीनन , मुआविज़ा
'दानिश' पे हो रहे हैं जो एहसान आजकल
------------------------------------------------
तरक्क़ी-याफ्ता = उन्नत / विकसित मानव
निगाह-ए-मस्त = मस्त आँखें
ज़ीस्त = ज़िन्दगी / जीवन
उनवान = शीर्षक / उद्देश्य
ज़ेहन = सोच / मानसिकता
अना = स्वाभिमान
मुआविज़ा = क़ीमत / वुसूली
--------------------------------------------------
कुछ 'यूं-ही-सी' व्यस्तताएं , कुछ
एक साहित्यिक पत्रिका "सरस्वती-सुमन" (देहरादून) के
'ग़ज़ल-विशेषांक' के अथिति-सम्पादन का जोखिम भरा कार्य ,,,
बस, ये सब मिल कर ही इम्तेहान लेने पर तुले हैं ...
ख़ैर ,,, आज एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ ....
ग़ज़ल
रहता नहीं है दिल में वो मेहमान आजकल
मेरी तरह, है वो भी परेशान आजकल
ख़ुशबू, गई रुतों की, धड़कती है आज भी
यूं भी महक रहा है ये सुनसान आजकल
फ़ुर्सत कहाँ , कि ख़ुद से कोई बात कर सके
ये है ! तरक्क़ी-याफ़्ता इन्सान आजकल
सच बोलते हो तुम , तो तुम्हे जानता है कौन
हर शख्स की है झूट से पहचान आजकल
तेरी निगाह-ए -मस्त के मुहताज हैं सभी
समझा , कि क्यों है मैकदा वीरान आजकल
वो मेरी ज़िन्दगी से अचानक निकल गया
बदला हुआ है ज़ीस्त का उनवान आजकल
माहौल पुरखतर है, कि बीमार ज़ेहन हैं
गुम है सभी के होटों से मुस्कान आजकल
अपना ज़मीर , अपनी अना बेचने के बाद
हर काम होता जाता है आसान आजकल
मांगेगी ज़िन्दगी , तू यक़ीनन , मुआविज़ा
'दानिश' पे हो रहे हैं जो एहसान आजकल
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तरक्क़ी-याफ्ता = उन्नत / विकसित मानव
निगाह-ए-मस्त = मस्त आँखें
ज़ीस्त = ज़िन्दगी / जीवन
उनवान = शीर्षक / उद्देश्य
ज़ेहन = सोच / मानसिकता
अना = स्वाभिमान
मुआविज़ा = क़ीमत / वुसूली
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Wednesday, November 24, 2010
शेक्सपियर ने कहा था ..."व्हाट इज़ इन द नेम ( नाम में क्या रखा है)"
उनका ये कथन बहुत जल्द एक मुहावरा-सा बन गया,,,
फिर कई सालों बाद स्विटज़रलैंड के किसी रचनाकार से बात करते हुए
विख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने कहा.. "नाम ही में बहुत कुछ रक्खा है"
ये कथ्य बस स्तम्भ-लेख का हिस्सा भर रहा...
गुलज़ार साहब का मानना ये रहा कि "नाम गुम जाएगा...."
और एक ये लोकोक्ति "नाम बड़े और दर्शन छोटे.."
अदाकारा मीना कुमारी (मरहूम) फरमाती थीं ...
"आगाज़ तो होता है,अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता॥"
और जावेद अनवर साहब ने उषा खन्ना के संगीत में रफ़ी जी से गवाया
"तुम भी कुछ अच्छा-सा रख लो अपने दीवाने का नाम..."
और नाम के सिलसिले में मुफ़लिस और दानिश दोनों का ये मानना है
"किरदार अहम् है दुनिया में , ये नाम बदलते रहते हैं..."
आज दानिश को आपके रु.ब.रु करते हुए मैं ये कुछ अलफ़ाज़
आप सब के सुपुर्द करता हूँ .......
उम्र के हर मोड़ पर हमने दिए क्या-क्या जवाब
उम्र भर उसके सवालों की न शिद्दत कम हुई
आज भी चुकता नहीं हो पाया क़र्ज़ा ज़ीस्त का
घट गया है और इक दिन , और मोहलत कम हुई
"दानिश" भारती
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क़र्ज़ा = क़र्ज़
शिद्दत = तीव्रता
जीस्त = ज़िन्दगी
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उनका ये कथन बहुत जल्द एक मुहावरा-सा बन गया,,,
फिर कई सालों बाद स्विटज़रलैंड के किसी रचनाकार से बात करते हुए
विख्यात लेखक खुशवंत सिंह ने कहा.. "नाम ही में बहुत कुछ रक्खा है"
ये कथ्य बस स्तम्भ-लेख का हिस्सा भर रहा...
गुलज़ार साहब का मानना ये रहा कि "नाम गुम जाएगा...."
और एक ये लोकोक्ति "नाम बड़े और दर्शन छोटे.."
अदाकारा मीना कुमारी (मरहूम) फरमाती थीं ...
"आगाज़ तो होता है,अंजाम नहीं होता, जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता॥"
और जावेद अनवर साहब ने उषा खन्ना के संगीत में रफ़ी जी से गवाया
"तुम भी कुछ अच्छा-सा रख लो अपने दीवाने का नाम..."
और नाम के सिलसिले में मुफ़लिस और दानिश दोनों का ये मानना है
"किरदार अहम् है दुनिया में , ये नाम बदलते रहते हैं..."
आज दानिश को आपके रु.ब.रु करते हुए मैं ये कुछ अलफ़ाज़
आप सब के सुपुर्द करता हूँ .......
उम्र के हर मोड़ पर हमने दिए क्या-क्या जवाब
उम्र भर उसके सवालों की न शिद्दत कम हुई
आज भी चुकता नहीं हो पाया क़र्ज़ा ज़ीस्त का
घट गया है और इक दिन , और मोहलत कम हुई
"दानिश" भारती
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क़र्ज़ा = क़र्ज़
शिद्दत = तीव्रता
जीस्त = ज़िन्दगी
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