Thursday, December 11, 2008

मेरी कविता

तेज़ , बहुत तेज़ दौड़ती
इस जिंदगी की
भागमभाग से हार कर ,
अजनबियत के सायों से परेशान हो कर ,
अकेलेपन को ओढे हुए
मैं . . .
जब भी कभी
किसी थकी-हारी शाम की
उदास दहलीज़ पर आ बैठता हूँ
तो
सामने रक्खे काग़ज़ के टुकडों पर
बिखरे पड़े
बेज़बान से कुछ लम्हे
मुझे निहारने लगते हैं...
मैं . .
उन्हें.. छू लेने की कोशिश में...
अपने होटों पर पसरी
बेजान खामोशी के रेशों को
बुन बुन कर
उन्हें इक लिबास देने लगता हूँ
और वो तमाम बिखरे लम्हे
लफ्ज़-लफ्ज़ बन
सिमटने लगते हैं....
और अचानक ही
इक दर्द-भरी , जानी-पहचानी सी आवाज़
मुझसे कह उठती है ....
मैं... कविता हूँ ...............!
तुम्हारी कविता .............!!
मुझसे बातें करोगे ......!?!

10 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

मुफलिस जी

आपको मेरा प्रणाम ,

आपने इतनी अच्छी कविता लिखी है की , बस मन डूब गया ;
पूरी की पूरी कविता ,जैसे हम सारे कवियों को represent करती है ..
हम सभी के साथ यूँ ही होता है ..

इन पंक्तियों ने तो जैसे कवि मन के भीतर झाँककर अपनी बात कह दी हो .

सामने रक्खे काग़ज़ के टुकडों पर
बिखरे पड़े
बेज़बान से कुछ लम्हे
मुझे निहारने लगते हैं...
मैं . .
उन्हें.. छू लेने की कोशिश में...
अपने होटों पर पसरी
बेजान खामोशी के रेशों को
बुन बुन कर
उन्हें इक लिबास देने लगता हूँ ...

मुझे अपना शागिर्द बना लो गुरु जी ...

आपका
विजय

manu said...

tarz ki baat ke baad maine aapka behad intezaar kiyaa tha...ab aapke aane kaa bahut bahut shukriya...
samajh nahin paata ke shaayer hain yaa kavi hain aap
manch pe alag andaaz aur blog pe alag........
us pr turraa ye ke dono ek se badhkar ek......
aapse ru b ru hone ki khwaahish hoti hai............

manu said...

chalo tarz wali baat pe ek behad maamooli sher.....

"be-takkhllus" tujhe muflis se shikaayat kyoon ho,,

too sahi hogaa magar wo bhi galat kyaa niklaa..

jaankari badhaane ka ek baar dobaara shukriyaa

MUFLIS said...

'..dil talak jaane ka rastaa bhi to niklaa dil se ,
ye shikaayat to faqat ek bahaana niklaa..."

hauslaa.afzaaee ke liya shukriyaa !
---MUFLIS---

विनय said...

भई मज़ा आ गया, वाह!

BrijmohanShrivastava said...

अति सुंदर रचना

RC said...

Aapki kavitaon ki maine kal alag se tareef nahin ki jab maine inhein padha. Bus itna kiya ke blog follow kiya :-)

Khair, thanks for your comments, I have posted reply for you. Do read!

RC

Harkirat Haqeer said...

मैं . .
उन्हें.. छू लेने की कोशिश में...
अपने होटों पर पसरी
बेजान खामोशी के रेशों को
बुन बुन कर
उन्हें इक लिबास देने लगता हूँ
और वो तमाम बिखरे लम्हे
लफ्ज़-लफ्ज़ बन
सिमटने लगते हैं....
और अचानक ही
इक दर्द-भरी , जानी-पहचानी सी आवाज़
मुझसे कह उठती है ....
मैं... कविता हूँ ...............!
तुम्हारी कविता .............!!
मुझसे बातें करोगे ......!?!

bhot hi behtreen nazm...! kahin bhitar tak chu jati hai aapki nazam.

दर्पण साह said...

dost apki to poem ....
...aur apki thought process ki....
jitni taarif ki jai kam hai....
badhai sweekarien....
gulzaar ke baad apne bhi mujhe impress kar diya. ye shayad (as Vijay Kumar Sappatti said) sab kaviyon ki atmkahta (ya kahein atmkavita) hain.

युगों से...
...एक कविता ....
लिखने बैठा हूँ....

आश्चर्य !

...पूरी नही होती...

मेरी कविता....
मेरा जीवन....
मेरा प्रेम...
और,
मेरा आत्मज्ञान....
...सब योगभ्रष्ट.

poemsnpuja said...

खूबसूरत है ये लिबास तो...कविता अच्छी लगी.