Saturday, December 12, 2015

पाला-पोसा उम्र-भर रक्खा दिल के पास
अब बूढ़े माँ-बाप का वृद्धाश्रम में वास
paala.posaa umr.bhar, rakkha dil ke paas
ab boodhe maa-baap ka vriddhaashram me vaas

Tuesday, October 13, 2015

लोग
जानते हैं तुम्हें
अपने-अपने ईष्ट के नाम से..
करते रहते हैं तुमसे
अपने हर-हर दुःख की बात
इक उम्मीद-सी रहती है उन्हें
कि सुन ली जाती है
उनकी कोई न कोई बात
कभी तो ...
और इसी धुन में
वो ख़ुद को ख़ुद से जुड़ा पाते हैं
ज़िंदा रहते हैं
ज़िन्दगी भर ही ...
हे परमेश्वर !
प्रार्थना है तुमसे
टूटने न पाए उनकी ये आस..
उनका ये विश्वास...
कभी भी . . .!!!

Tuesday, July 7, 2015

--- ग़ज़ल ---

'हाँ' , 'ना' कहना सीखो जी
रौब न सहना , सीखो जी

कुछ अपने, कुछ दूजों के
रंग में रहना, सीखो जी

कल-कल करती नदियों से
पल-पल बहना सीखो जी

छाँव भले ललचाती हो
धूप भी सहना सीखो जी

मीठे बोल, मधुर लहजा
सुन्दर गहना ! सीखो जी

वक़्त की मर्ज़ी के आगे
कुछ-कुछ ढहना सीखो जी

जब कहने को बात न हो
तब चुप रहना सीखो जी

शब्द तो कहते हो "दानिश"
अर्थ भी कहना सीखो जी

Monday, January 19, 2015

ग़ज़ल / GHAZAL


कोई सूरत निकालिये साहिब
ख़ुद को दुनिया में ढालिये साहिब

अस्ल चेहरा छिपा रहे जिसमें
इक नक़ाब ऐसा डालिये साहिब

'वाह' कह कर निभाइए  सबसे
यूँ न कमियाँ निकालिये साहिब

ख़्वाब कोई तो फल ही जाएगा
ख़्वाहिशें ख़ूब पालिए साहिब

मैकदे में भी आपसी झगड़े
छोड़िये, ख़ाक डालिये साहिब

ये ज़बां कौन अब समझता है
आँसुओं को सँभालिए साहिब

जो हक़ीक़त बयां न कर पाए
वो क़लम तोड़ डालिये साहिब

क्या उसूल और क़ाइदा कैसा
काम अपना निकालिये साहिब

मुस्कुराहट में भी नमी, "दानिश"
बात हँस कर न टालिए साहिब  

Wednesday, December 3, 2014

कुछ यादें,
जब साथ रहती हैं
तो दे जाती हैं ज़िंदगी को
दर्द,
चुभन,
इक अनचाहा-सा ख़याल ...
 

और कुछ यादें,
जब साथ रहती हैं
तो भर देती हैं ज़िंदगी में
सलीक़ा,
हिम्मत,
इक मनचाहा-सा अहसास ...
 

ख़ैर ....!
ज़िंदा बना रहता है इन्सान
यादों के साथ बँधे रहने से ..... !!!

Monday, November 24, 2014

ज़िंदगी में ...  आप
ज़िंदगी का बहाना ... आप
ज़िंदगी का सहारा ... आप
ज़िंदगी की वज्ह ... आप
ज़िंदगी का मक़सद ... आप
…   …   .... 
हर घड़ी , हर पल  . . .
मेरे साथ बने रहने के लिए
धन्यवाद  ...
हे ईश्वर  !
आपका  ढेरों ढेरों धन्यवाद   !!!

Thursday, March 8, 2012

कुछ रास्ते, तो मानो बंद गलियों की तरह
रुक-से जाते हैं .... ढूँढना, बस ढूँढना ही
चारा रह जाता है ,,, कभी कभी ....
एक ग़ज़ल हाज़िर करता हूँ ...

ग़ज़ल



जो तेरे साथ-साथ चलती है

वो हवा, रुख़ बदल भी सकती है


क्या ख़बर, ये पहेली हस्ती की

कब उलझती है, कब सुलझती है


वक़्त, औ` उसकी तेज़-रफ़्तारी

रेत मुट्ठी से ज्यों फिसलती है


मुस्कुराता है घर का हर कोना

धूप आँगन में जब उतरती है


ज़िन्दगी में है बस यही ख़ूबी

ज़िन्दगी-भर ही साथ चलती है


ज़िक्र कोई, कहीं चले , लेकिन

बात तुम पर ही आ के रूकती है


ग़म, उदासी, घुटन, परेशानी

मेरी इन सबसे खूब जमती है


अश्क लफ़्ज़ों में जब भी ढलते हैं

ज़िन्दगी की ग़ज़ल सँवरती है


नाख़ुदा, ख़ुद हो जब ख़ुदा 'दानिश'

टूटी कश्ती भी पार लगती है


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