तो कुछ भी कह लो, सुन लिया जाता है ...
अब आख़िर खामोशी के ज़ेवर को उतार कर
कहाँ रख दिया जाए ...शकील ने भी तो कहा है
ज़रा तू ही बता ऐ दिल सुकूँ पाने कहाँ जाएं...
khair...ab अल्फ़ाज़ की बुनावट है या बनावट ,
एक नज़्म हाज़िर है .......
मैंने ...देखा उसे
मैंने देखा उसे
दूर ....
कहीं दूर.. खालीपन में
टकटकी लगा
घंटों... देखते हुए
मैंने देखा उसे
ख़ुद ही से रूठ कर
ख़ुद पर ही एक
बेजान-सी खामोशी ओढे हुए
मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए
और...
जब कभी...
उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...
तो...
मैंने देखा उसे
... बिना हड़बडाये
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह...
हँसते हुए... , मुस्कराते हुए...
हालाँकि...
मालूम उसे भी है ....
कि... सच क्या है ....
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