सोमवार, ९ नवम्बर २००९

सूना तो यही है कि कहने को जब कुछ न हो
तो कुछ भी कह लो, सुन लिया जाता है ...
अब आख़िर खामोशी के ज़ेवर को उतार कर
कहाँ रख दिया जाए ...शकील ने भी तो कहा है
ज़रा तू ही बता ऐ दिल सुकूँ पाने कहाँ जाएं...
khair...ab अल्फ़ाज़ की बुनावट है या बनावट ,
एक नज़्म हाज़िर है .......


मैंने ...देखा उसे


मैंने देखा उसे
दूर ....
कहीं दूर.. खालीपन में
टकटकी लगा
घंटों... देखते हुए

मैंने देखा उसे
ख़ुद ही से रूठ कर
ख़ुद पर ही एक
बेजान-सी खामोशी ओढे हुए

मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए

और...
जब कभी...
उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...

तो...
मैंने देखा उसे
... बिना हड़बडाये
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह...
हँसते हुए... , मुस्कराते हुए...

हालाँकि...
मालूम उसे भी है ....
कि... सच क्या है ....

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गुरुवार, २२ अक्तूबर २००९

मजबूर बहुत करता है ये दिल तो जुबां को ....अचानक ही
ये गीत ज़हनमें आ गया ..आप सब ने तो सुना ही होगा ...
तसव्वर कीजिये ...ज़िन्दगी कई बार इंसान को इम्तिहानात
और आज़माईश में डाल कर ख़ुद जीत जाती है ...हालात ऐसे
न-साज़गार कि मन का भारीपन होटों की बेजान खामोशी में
तब्दील हो जाता है ..वक़्त की बेरूखी आंखों के खालीपनको भांप कर
और भी शदीद हो उठती है । काश ! बेबसी, कभी इंसान पर इस क़दर
भी न हावी होने पाये ...और ऐसे में खुदावंद का नाम तो
यक़िननबहुत बड़ा संबल बन जाता है ........



ग़ज़ल


दाता , नाम कमाई दे
साँसों में सच्चाई दे

दर्द-ओ-ग़म हँसके सह लूँ
हिम्मत को अफ़्ज़ाई दे

मेहनत-कश लोगों को तू
मेहनत की भरपाई दे

शोरो-गुल में क़ैद हूँ मैं
अब थोड़ी तन्हाई दे

चैन मिले जो यूँ उसको
दे , मुझको , रुसवाई दे

कह लूँ दिल की बात तुम्हें
लफ्ज़ों को सुनवाई दे

एक सनम मेरा भी हो
मुख़लिस , या हरजाई , दे

हर दिल में हो नाम तेरा
हर दिल को ज़ेबाई दे

मेरे नेक ख़यालों को
वुसअत औ` गहराई दे

आँखें रिमझिम भीग सकें
यादों की पुरवाई दे

आँगन-आँगन खुशियाँ हों
घर-घर में रा' नाई दे

कर मुझको तौफ़ीक़ अता
'मुफ़लिस' को अगुवाई दे



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afzaaee = vriddhee,,, मुख़लिस=निष्कपट
हरजाई=निष्ठाहीन,,, ज़ेबाई = नैसर्गिक सौन्दर्या
वुस अत=विस्तार,,, रा`नाई= सुन्दरता
मुफ़लिस=मासूम/गरीब
तौफ़ीक़=ईश्वरीय सामर्थ्य
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बुधवार, ३० सितम्बर २००९

२ अक्तूबर का दिन भारत के इतिहास में ख़ास एहमियत रखता है
इस तिथि को हम सब राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी जी और हमारे
भूतपूर्व प्रधान-मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जनम दिवस
के रूप में मनाते हैं....शास्त्री जी की सादगी और स्वाभिमान पर
और गाँधी जी के अहिंसा के सिद्धांत पर हम सब को गर्व है .......
महात्मा गाँधी जी के व्यक्तित्व को शब्दों में बाँधना आसान नही ।
एक गीतनुमा कविता प्रस्तुत है ..राष्ट्रपिता को श्रद्धांजली .....


गीत


भारत जब जब दोहराएगा आज़ादी के गान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को


लन्गोती वाले बाबा की , ऐसी एक लड़ाई थी
ना गोला बरसाया कोई , ना तलवार चलाई थी
सत्य अहिंसा के बल पर दुश्मन को धूल चटाई थी
मन की ताक़त ही से उसने रोका हर तूफ़ान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...


सच की लाठी हाथों में ली, तन पर भक्ति का चोला
पाठ अहिंसा का सिखला कर हर मन में अमृत घोला
आज़ादी के रंग में रँग कर हर भारतवासी बोला
भारत माँ पर अर्पण कर देंगे हम अपनी जान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...


खादी के ताने-बाने से भारत का इतिहास रचा
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब में इक विश्वास रचा
सहम गया कुख्यात फिरंगी ऐसा इक अभ्यास रचा
मान गया अंग्रेजी शासन बापू की पहचान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...


जिस गांधी ने सारे जग में हिन्दुस्तां का नाम किया
उस पर ही इक घातलगा कर अनहोनी ने काम किया
बापू ने बस राम कहा, चिर-निद्रा में विश्राम किया
वक्त नमन करता है हर पल सच्चाई की शान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को .



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मंगलवार, ८ सितम्बर २००९

नमस्कार ।
ज़िन्दगी और मस्रुफियात का भी अजीब सा लेकिन पक्का रिश्ता है
फुर्सत के लम्हे चुरा पाना भी अपने आप में महारत ही है ।
इंसान , आज , जाने कयूं बस अपने आप के बारे में ही सोचने की फितरत
पाले रहने पर मजबूर सा होता जा रहा है । वजह.... वक्त है , हालात हैं , या
हमारा ये चौतरफा ....भाग-दौड़ वाला.... ख़ुद भागता-दौड़ता चौतरफा ....
खैर ....ये कहानी फिर सही ....
आप सब की खिदमत में एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूँ ......


ग़ज़ल

किसी के कोई काम आओ , तो मानें
कि ख़ुद को कभी आज़माओ, तो मानें

खुशी के पलों में तो हँसते रहे हो
मुसीबत में भी मुस्कराओ , तो मानें

बनावट- नुमा ज़िन्दगी छोड़ कर तुम
हकीक़त से रिश्ता बनाओ , तो मानें

हमेशा चरागों तले है अँधेरा
भरम ये कभी तोड़ पाओ , तो मानें

रहो सामने भी , छिपे भी रहो तुम
मुहब्बत में इतना सताओ , तो मानें

किसी और में खोट कयूं ढूँढ़ते हो
कभी ख़ुद को दरपन दिखाओ, तो मानें

नए दौर के साथ चलते हुए तुम
पुरातन की रस्में निभाओ , तो मानें

परों की नही , बात है हौसलों की
इरादे फ़लक तक बनाओ , तो मानें

खफा हो के मुझसे , कहा ज़िन्दगी ने
मेरे नाज़ हर पल उठाओ , तो मानें

कई ग़मज़दा लोग, 'मुफ़लिस', मिलेंगे
उन्हें भी गले से लगाओ , तो मानें




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मंगलवार, २५ अगस्त २००९

नमस्कार !!
कोई वक्त था कि
खतों कि बड़ी एहमियत हुआ करती थी ....ख़त लिखना , ख़त पढ़ना ,
ख़त का इंतज़ार करना सभी कुछ बहुत अच्छा लगता था ...
और वो ख़त..... जो मानिए आँख की सियाही से लिखे गए हों ...
आंखों में उभरते कतरों के साथ पढ़े गए हों ...
उन खतों की कैफ़ियत का अंदाज़ा तो आप को मालूम
ही होगा ....... खैर ! एक नज़्म आपकी खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ ।



वो ख़त


अभी अभी .......अचानक
दिल में इक एहसास ने अंगडाई ली
एक जाना-पहचाना ,
अपना-सा एहसास
यूँ लगा .....
जैसे
तेरा धुंधला सा कोई अक्स
तेरा खुशबु से भरा इक ख़याल
तेरे क़दमों की मखमली-सी इक आहट
तेरे हाथों की रेशम-सी इक छुअन
ये सब... .
मेरे ज़हनो-दिल को गुदगुदाते हुए
जैसे....
मुझे छू कर गुज़र गए हैं
हाँ ! याद आया !!
आज
तेरे उस ख़त को
देर तक पढ़ते-पढ़ते....
मैंने ....
अपनी थकी-मांदी
पलकों पर रख छोड़ा था




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सोमवार, १० अगस्त २००९

kavita

ग़ज़ल की बंदिशों के इलावा कविता या नज़्म की आज़ादी का
अपना ही लुत्फ़ है । कई विद्वान् रचनाकारों द्वारा अच्छी-अच्छी
कविताएँ लिखी जाती हैं और पढने वालों तक ब.खूबी पहुंचाई
जा रही हैं । मन में एक नज़्म का ख़याल आया है ।
अब एक अदना-सी कोशिश है
जो भी है ....मन से है ...मन के लिए है ...आप सब के लिए है ।



उधेड़-बुन





मन की उकताहट ,

मन की बेकली .....

अचानक जब टीस बन करवट लेती है...तो...

जाने कयूं

चुभने-चुभने सा लगता है सब ...

आंखों का सूनापन

होटों पर पसरी चुप्पी

ख़ुद ही से बेगानगी

बेतरह सी उदासी

और कहीं......

अन्दर ही अन्दर

चल पड़ती है इक उधेड़-बुन .....

जैसे

आँख के किसी बेजान क़तरे को

बड़ी हिफाज़त से

लफ्जों में तब्दील करने की कोशिश

ज़हनमें कुलबुलाते किसी गुबार को

खयाली लिबास देने की तड़प

सोच , एहसास , जज़्बात को

इज़हार देने की छटपटाहट ......

और......धीरे-धीरे....

कुछ नक़्श ......

उभरने भी लगते हैं.....

लम्हा-लम्हा पिघलती रात की आगोश में

जाने क्या-क्या समाता चला जाता है

और अगली सुबह ......

एक काग़ज़ के टुकड़े पर

बिखरे पड़े अल्फाज़ को

मैं .......

निहारता हूँ....

फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर

सोचने लगता हूँ

मानो ....

मैंने कोई कविता कह ली हो ......

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बुधवार, २२ जुलाई २००९

"आज की ग़ज़ल" नामक ब्लॉग पर वक्तन ब वक्तन एक तर`ही ग़ज़ल
के लिए (लिखने के लिए) कहा जाता है .... इस बार का मिसरा था ...
"सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है..."
वहाँ नामी-गिरामी अदीब लोगों की ग़ज़लें पढने को मिल जाती हैं
मैंने भी इसी ज़मीन और बहर में ग़ज़ल कही है जो मैं चाहता हूँ कि
आप यहाँ भी पढ़ें ।


ग़ज़ल


सब की नज़रों में सच्चा इंसान वही कहलाता है
जो जीवन में दर्द पराये भी हँस कर सह जाता है

जब उसकी यादों का आँचल आँखों में लहराता है
जिस्म से रूह तलक फिर सब कुछ खुशबु से भर जाता है

रिमझिम-रिमझिम, रुनझुन-रुनझुन बरसें बूंदें सावन की
पी-पी बोल, पपीहा मन को, पी की याद दिलाता है

व्याकुल, बेसुध, सम्मोहित-सी राधा पूछे बारम्बार
देख सखी री ! वृन्दावन में बंसी कौन बजाता है

जीवन का संदेश यही है नित्य नया संघर्ष रहे
परिवर्तन का भाव हमेशा राह नयी दिखलाता है

पौष की रातें जम जाती हैं, जलते हैं आषाढ़ के दिन
तब जाकर सोना फसलों का खेतों में लहराता है

माना ! रात के अंधेरों में सपने गुम हो जाते हैं
सूरज, रोज़ सवेरे फिर से आस के दीप जलाता है

आज यहाँ, कल कौन ठिकाना होगा कुछ मालूम नहीं
जग है एक मुसाफिरखाना, इक आता, इक जाता है

मर जाते हैं लोग कई, दब कर क़र्जों के बोझ तले
रोज़ मगर बाज़ार का सूचक , अंक नए छू जाता है

हों बेहद कमज़ोर इरादे जिनके बस उन लोगों का
सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है

वादे, यादें , दर्द , नदामत , ग़म , बेचैनी , तन्हाई
इन गहनों से तो अब अपना जीवन भर का नाता है

धूप अगर है, छाँव भी होगी, ऐसा भी घबराना क्या
हर पल उसको फ़िक्र हमारा, जो हम सब का दाता है

हँस दोगे तो, हँस देंगे सब, रोता कोई साथ नहीं
आस जहाँ से रखकर 'मुफ़लिस' क्यूं खुद को तड़पाता है


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