Monday, August 10, 2009

kavita

ग़ज़ल की बंदिशों के इलावा कविता या नज़्म की आज़ादी का
अपना ही लुत्फ़ है । कई विद्वान् रचनाकारों द्वारा अच्छी-अच्छी
कविताएँ लिखी जाती हैं और पढने वालों तक ब.खूबी पहुंचाई
जा रही हैं । मन में एक नज़्म का ख़याल आया है ।
अब एक अदना-सी कोशिश है
जो भी है ....मन से है ...मन के लिए है ...आप सब के लिए है ।



उधेड़-बुन





मन की उकताहट ,

मन की बेकली .....

अचानक जब टीस बन करवट लेती है...तो...

जाने कयूं

चुभने-चुभने सा लगता है सब ...

आंखों का सूनापन

होटों पर पसरी चुप्पी

ख़ुद ही से बेगानगी

बेतरह सी उदासी

और कहीं......

अन्दर ही अन्दर

चल पड़ती है इक उधेड़-बुन .....

जैसे

आँख के किसी बेजान क़तरे को

बड़ी हिफाज़त से

लफ्जों में तब्दील करने की कोशिश

ज़हनमें कुलबुलाते किसी गुबार को

खयाली लिबास देने की तड़प

सोच , एहसास , जज़्बात को

इज़हार देने की छटपटाहट ......

और......धीरे-धीरे....

कुछ नक़्श ......

उभरने भी लगते हैं.....

लम्हा-लम्हा पिघलती रात की आगोश में

जाने क्या-क्या समाता चला जाता है

और अगली सुबह ......

एक काग़ज़ के टुकड़े पर

बिखरे पड़े अल्फाज़ को

मैं .......

निहारता हूँ....

फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर

सोचने लगता हूँ

मानो ....

मैंने कोई कविता कह ली हो ......

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31 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति। पर प्रवाह मे कुछ अवरोध सा लगता है।

Mrs. Asha Joglekar said...

AUR FIR SOCHANE LAGATA HOON JAISE MAINE KOEE KAWITA LIKH DEE HO .....AISE HEE TO JANMATEE HAI KAWITA.

दर्पण साह "दर्शन" said...

maano?

huzoor aapne sach main hi kavita keh li hai...

...maine aapse pehle bhi kaha tha ki mujhe aapki kavitaein (bhi) prabhivit karti hain, aur aapki ghazal se zayada aapki kavitaon ka intzaar rehta hai...

लम्हा-लम्हा पिघलती रात की आगोश में जाने क्या-क्या समाता चला जाता है और अगली सुबह !! एक काग़ज़ के टुकड़े पर बिखरे पड़े कुछ अल्फाज़ को मैं ....... निहारता हूँ.... फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर सोचने लगता हूँ मानो .... मैंने कोई कविता कह ली हो ......

laghbag kuch aisa hi mere saath bhi hota hai...
.......aur agle din wo kavita hoti hai.

kabhi kabhi to ye lagta hai ki ye main nahi,
ye rachna meri nahi.
aur shayad yahi sach bhi ho...

संजीव गौतम said...

भाई जी अच्छे लोग अच्छा ही लिखेंगे. आपकी ग़ज़लें, आपकी टिप्पणियां और अब ये नज़्म सब कुछ बेहतरीन आपकी कहन का थोडा सा अंश ईश्वर करें मुझे भी मिल जाये.

M.A.Sharma "सेहर" said...

सोच , एहसास , जज़्बात को लफ्जों में तब्दील करने की कोशिश ..
उम्दा सफल कोशिश रही और इक संवेदनशील, भावपूर्ण कविता बन गयी

मुफ़लिस जी
आप के लेखन को नमन है मेरा
शब्दों के अभाव में बस इतना ही !!

विनोद कुमार पांडेय said...

man ki udhedbun ko aapne bahut badhiya tarike se vyakt kiya hai..
shabd ke dhani hai aap..
maine itane behtreen shabdo ka pryog itane sundar dhang se bahut hi kam dekhe hai..

kavita to sundar hai hi..badhayi ..

दिगम्बर नासवा said...

लम्हा-लम्हा
पिघलती रात की आगोश में
जाने क्या-क्या समाता चला जाता है
और अगली सुबह !!
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
बिखरे पड़े कुछ अल्फाज़ को मैं .......
निहारता हूँ...

BHAAV, KUCH EHSAAS KARVAT BADAL KAR SHABDON KA ROOP LENE LAGTE HAIN TO KAVITA KA NIRMAAN TO HONAA HI HAI.....

AAPKI GAZAL, SHAYRI, NAJM AUR KAVITA.... SAB KUCH LAJAWAAB HOTA HAI...

कंचन सिंह चौहान said...

बहुत खूब...!

vandana said...

bahut hi sundar bhavavyakti.

RC said...

bahut achchi kavita Muflis ji ... soft and effecttive. Good one!

God bless
RC

Manish Kumar said...

कविता लिखने के पहले की मनःस्थिति को उकेरने में आप पूरी तरह सफल रहे हैं.

BrijmohanShrivastava said...

असली कविता ऐसे ही होती है वाकी तो सब शब्दों का ताना बाना है

manu said...

जी हुजूर...........
एक दम ऐसा ही होता है..जो आपने बड़ी खूबसूरती से बयां किया है..
कहूँगा के नज़्म कहने की प्रक्रिया को आपने बहुत ही सहजता से कह डाला है...

फिर अपनी किताबों में...
संभाल कर रख कर सोचने लगता हूँ मानो ....
मैंने कोई कविता कह ली हो .................

कुछ और ध्यान आया..

सानिहे बेखुदी की रातों के
दिन का अक्सर सवाल होते हैं..

abdul hai said...

Nice

योगेश स्वप्न said...

muflis ji , aapne vastav mein bahut hi umda kavita kah li hai. aapka andaaz apna sa laga. badhaai.

Harkirat Haqeer said...

न जाने कितनी बार नज़्म को पढ़ती गयी ...हर बार मुझे किसी और गहराई में ले जाकर खडा कर देतीं .....

आँख से टपके किसी बेजान क़तरे को
बड़ी हिफाज़त से लफ्जों में तब्दील करने की कोशिश में
आप पुर्णतः सफल हुए हैं ....मुझे न तो कहीं गति में अवरोध लगा न प्रवाह में कमी ......ज़हनमें कुलबुलाते गुबार को आपने बखूबी लिबास पहनाया है ....और जो नक़्श उभरते हैं.....वो आपके लेखन की तारीफ खुद करते हैं ....पर उन्हें समझने के लिए दर्द के रास्ते से गुजरना पड़ता है ....

और अगली सुबह !!
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
बिखरे पड़े कुछ अल्फाज़ को
मैं .......
निहारता हूँ....
फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर
सोचने लगता हूँ
मानो ....
मैंने कोई कविता कह ली हो ......

लाजवाब .......!!!

Babli said...

बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना बहुत अच्छी लगी!

Vijay Kumar Sappatti said...

muflis ji , kal hi maine ye kavita padh li thi .. man kahi door bhatak gaya tha .. aapki rachnao me bhaavnao ki jo gahraayi hoti hai wo kabeel tareef hai ... is kavita me jazbaat bahut hi swabhavik ,lekin asardaar tareeke se ubhare hue hai ... mera naman aapki lekhni ko aur salaam aapko is kavita par ...

namaskar.

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

Dr.T.S. Daral said...

बहुत खूब.

गौतम राजरिशी said...

सच कहा गुरूवर...कई बार मन ग़ज़ल की बंदिशों को झटक कर बस एक आजाद उड़ान भर लेना चाहता है भावों को शब्दों में ढ़ालते हुये...और कोई नज़्म जब मन से मन के लिये लिखी जाय तो उसे औरों के मन तक तो पहुँचना लाजिमी ही है।

भूमिका के पश्‍चात नज़्म सचमुच मन की परतों तक पहुँची खुद-ब-खुद...! एक कागज़ पर बिखरे ये चंद अल्फ़ाज फिर महज अल्फ़ाज कहाँ रह गये।

vikram7 said...

sundar racana
स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

hem pandey said...

नज्म में कविता के जन्म की विडियोग्राफी देखने को मिली.

sarwat m said...

मेरे एक मित्र की दो पंक्तियाँ हैं:
तुम जिस चिंगारी को छू लो
उडे और जुगनू बन जाये
एक रचनाकार अपनी रचना प्रक्रिया का इससे बेहतर चित्रण शायद नहीं कर सकता. मैं आपको मुबारकबाद पेश करता हूँ.

नीरज गोस्वामी said...

देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ....इस नज़्म पर कुर्बान होने को दिल कर रहा है...ये कमाल आपकी लेखनी का है...जिस विधा पर चलती है...कमाल करती है...नज़्म हो ग़ज़ल हो कविता हो...वाह...इस फ़न को किसी की नज़र न लग जाये...
नीरज

Prem Farrukhabadi said...

bahut sundar.badhai!!

mayank.k.k. said...

सच में कविता अच्छी बन पडी है ,एकदम सलीके से बुनी है
मुबारक हो

'अदा' said...
This comment has been removed by the author.
'अदा' said...

और......धीरे-धीरे....
कुछ नक़्श ......
उभरने भी लगते हैं.....
लम्हा-लम्हा पिघलती रात की आगोश में
जाने क्या-क्या समाता चला जाता है
और अगली सुबह ......
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
बिखरे पड़े अल्फाज़ को
मैं .......
निहारता हूँ....
फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर
सोचने लगता हूँ
मानो ....
मैंने कोई कविता
हाँ,, बिलकुल ऐसा ही तो हुआ होगा उस रात....

Mumukshh Ki Rachanain said...

संभाल कर रख कर सोचने लगता हूँ मानो ....
मैंने कोई कविता कह ली हो .................

कह ही ली और वह भी लाजवाब.
बधाई.

योगेन्द्र मौदगिल said...

बढ़िया कविता कही है आपने मुफलिस जी बधाई... और हां हज़ल देहरादून रवाना कर दी थी ना..?

manu said...

मन की उकताहट , मन की बेकली .....अचानक जब टीस बन करवट लेती है...तो... जाने कयूं चुभने-चुभने सा लगता है सब ... आंखों का सूनापन............


हुज़ूऊऊऊर ,,,,,,,,

अब इस उधेड़ बुन से बाहर भी आइये ...
कई दिन हुए
कुछ नया कहिये
कुछ नया पढ़वाइये