Monday, November 9, 2009

सूना तो यही है कि कहने को जब कुछ न हो
तो कुछ भी कह लो, सुन लिया जाता है ...
अब आख़िर खामोशी के ज़ेवर को उतार कर
कहाँ रख दिया जाए ...शकील ने भी तो कहा है
ज़रा तू ही बता ऐ दिल सुकूँ पाने कहाँ जाएं...
khair...ab अल्फ़ाज़ की बुनावट है या बनावट ,
एक नज़्म हाज़िर है .......


मैंने ...देखा उसे


मैंने देखा उसे
दूर तक ....
खालीपन में...
घंटों....
टकटकी लगा.. देखते हुए

मैंने देखा उसे
ख़ुद ही से रूठ कर
ख़ुद ही पर
एक बेजान-सी खामोशी
ओढे हुए....

मैंने देखा उसे
किसी भी हालात का
शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए....

और... .
जब कभी....
उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...

तो...
मैंने देखा उसे

... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए.....!!






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33 comments:

महावीर said...

मुफ़लिस साहब
आदाब
आपके ये अल्फ़ाज़ 'कहने को जब कुछ न हो तो कुछ भी कह लो' आपकी इस खूबसूरत रचना पर लागू नहीं होती. इसमें तो आप बहुत कुछ कह गए हैं - खूबसूरत भाव, अल्फाज़ का चुनाव, कहने का अंदाज़ कुल मिला कर एक असरदार नज़्म है. आजाद शायरी में अपने जज़्बात को खूबसूरती से बयान करना आसान नहीं है, यह भी एक कला है और यह कला हर शायर के पास नहीं है. आपकी इस नज़्म ने यह साबित कर दिया है कि आजाद शायरी में भी आपकी कलम इस हुनर को जानती है.

मैंने देखा उसे
ख़ुद ही से रूठ कर
ख़ुद पर ही एक
बेजान-सी खामोशी ओढे हुए

निहायत खूबसूरत!
महावीर

योगेश स्वप्न said...

wah muflis ji bahut kuch kah gai ye nazm.

MANOJ KUMAR said...

शानदार और मनमोहक।

Babli said...

बेहद ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने जो दिल को छू गई! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है !

पदमजा शर्मा said...

मुफ़लिस जी ,
अपने आप से झगड़ना ,शून्य में ताकना ,अकारण रोना , हँसना , इस सब को आपने ठीक से नज़्म में रखा है .

कंचन सिंह चौहान said...

पता नही किसकी बात कही है आपने जो यही कहीँ इर्द गिर्द दिख रहा है....! बहुत बार देखा हुआ सा....!!!

दिगम्बर नासवा said...

bahoot से bejaan shabdon को कविता का रूप दे कर paayne nikaal दिए ...... bahoot khoob ..बिना कुछ kahe bahoot कुछ kahna kopi aapse seeke ... lajawaab Sir ...

"अर्श" said...

मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए

और ....

अगर ऐसी रचना को इसी बे-फजूल की बात कहते हो
तो मैं तो हक्का-बक्का सा हो रहा था मगर फिर सोचा
आपकी शक्शियत ही ऐसी है , बड़ी बाते आप कितने ही छोटे
लहजे में कर जाते हो ... बहुत ही बधाई इस नायाब
रचना के लिए


अर्श

Dr. Amar Jyoti said...

'हालाँकि…
मालूम उसे भी है…
कि… सच क्या है…'
सब कुछ तो कह दिया। वो भी इतने कम शब्दों में। बधाई।

रश्मि प्रभा... said...

जब कोई किसी से प्यार करता है तो यूँ ही अपनी हर मनःस्थिति से परे एक मुस्कान बिखेर देता है

RC said...

Bahut bahut khoobsoorat rachana, Muflis ji. Khoobsoorat bahav .. bilkul waise hi hole hole il ki gehrayi mein utarti hai jaisi likhi gayi hai.
Very touching.

RC

डॉ टी एस दराल said...

मुफलिस जी नमस्कार.
बहुत दिनों बाद आपको पढने को मिला.

मैंने देखा उसे
दूर ....
कहीं दूर.. खालीपन में
टकटकी लगा
घंटों... देखते हुए

बहुत अच्छी ख्यालों की उडान .

बेहतरीन रचना.

raj said...

long hv i waited,,words refuse to sit on paper..the poem is awesome...

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत खूबसूरत अंदाज़ मे कही गई नज्म ।
मैंने देखा उसे
... बिना हड़बडाये
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह...
हँसते हुए... , मुस्कराते हुए...

हालाँकि...
मालूम उसे भी है ....
कि... सच क्या है ....
वाह ।

Harkirat Haqeer said...

मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए

बहुत ही उम्दा नज़्म........

खुदा करे ये नमी दोबारा न आये ......!!

rashmi ravija said...

मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए ..kaisi bebasi hai..sabke dilon par taari..sundar rachna.

Nirmla Kapila said...

मुफलिस जी मैं भी शायद कुछ बदकिस्मत ही हूँ कि बहुत देर से आपके बारे मे जाना असल मे मुझे लगता है कि मुझे गज़ल लिखनी नहीं आ सकती इस लिये कभी इस तरफ ध्यान भी नहीं दिया । अब कुछ रुची इस उम्र मे आ कर जागी है तो आप सब को जाना। और आपकी गज़ल तो कहीं भी मिल जाये पढे बिना जाती नहीं कई बार अर्श से भी आपके बारे मे चर्चखुई है । आज की गज़ल पर आज ही आपकी गज़ल पढी लाजवाब गज़ल के लिये बधाई आप पर कोई टिप्पणी करने जैसी सशक्त मेरी कलम नहीं है इस लिये कुछ झिझक के साथ पढ कर ही लौट जाती हूँ। आपने जिस तरह मेरी गज़ल के लिये मेरा हौसला बढाया हैुस के लिये धन्यवादी हूँ । अपना ये स्नेह बनाये रखें

मैंने देखा उसे
हालात का शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए
आपकी कविता के ये शब्द शायद कहीं न कहीं हम सब के शब्द हैं बहुत गहरी अभिव्यक्ति है बधाई और शुभकामनायें

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

muflis sahab aadab!mere blog per aane ka shukriya!aapko sunne ka mouka yahan mila hai,gazal ko kavita[nazm] kahte dekhkar achha laga.kavita ki gazal sunne blog per tashreef late rahenge yahi umeed karti hun.

लता 'हया' said...

aadab;
shukria.............
1.meri gazal gaur se padhne ke liye.
2.itne tavil comment ke liye,

AUR 3.apni umda azad nazm hum tak pahunchane ke liye.

AAPKI DAAD NE BHI BAHUT MUTASSIR KIYA .

mridula pradhan said...

sunder shabdon ka chayan aur usse
bhi sunder bhavon ne man ko choo
liya. mubarakbad sweekar kariyega.

नीरज गोस्वामी said...

हुजुर गुस्ताखी माफ़ हो...मेरी नज़र का कसूर है जिसने मुझे आपकी इस बेहतरीन नज़्म से इतने दिनों दूर रक्खा...आप के ख्याल और लफ्ज़ दोनों बेमिसाल हैं....क्या टिप्पणी करूँ उन पर...इतनी लियाकत कहाँ...
नीरज

manu said...

कल सोचा,
के कल कुछ और समझ कर कमेन्ट दूंगा,,
पर ज्यादा नहीं समझ सका.... नज्म एकदम साफ़ है...
मगर इसके भीतर की उथल-पुथल समझ नहीं आ रही...

पर अब लिख ही डाला है तो उम्मीद है के सब ठीक ही होगा...

उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...

तो...
मैंने देखा उसे
... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...


बहुत दिल के पास लगा ये सब... एक दम अपना सा....




हालाँकि...
मालूम उसे भी है ....
कि... हक़ीक़त क्या है ....
( यहाँ आकर खटका आ गया जी )

गौतम राजरिशी said...

"जरा तू ही बता ऐ दिल सुकूं पाने कहां जायें..."

सचमुच!

नज़्म तो आकर दो-तीन दफ़ा पढ़ चुका था, कुछ कहने को शब्द नहीं संजो पा रहा था। एक राज की बताऊं तो यहां आपकी इस खूब्स्सूरत नज़्म में "उसे" की जगह "तुम" डालकर आपनी अर्धांगिनी को सुना चुका हूं।

नमन है गुरूवर!

श्रद्धा जैन said...

झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए

Muflis ji aapne bhi kamaal ki baat kahi hai
jab kuch n kahne ko ho to .....
jazbaat bahut achche lage

श्याम कोरी 'उदय' said...

... अतिसुन्दर !!

sandhyagupta said...

... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए.....!!

Zindagi ki kitab ke kai purane panne yaad aa gaye..

रचना दीक्षित said...

... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए.....!!
आप की इस बेहतरीन रचना में कहीं न कहीं हम अपने आप को भी खड़ा पाते हैं
बधाई स्वीकारें इस सुंदर प्रस्तुती पर

"अर्श" said...

BADE ACHHE LAGTE HAIN... :)

AAJ FIR GUNGUNAANE KA MAN KAR DIYA KHUDBAKHUD... PATA NAHI KYUN... KYA AAP BATAA SAKTE HO.????


SALAAM

ARSH

ज्योति सिंह said...

और... .
जब कभी....
उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...

तो...
मैंने देखा उसे

... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए.....!!
bahut shaandar nazm , man ki sthiti ko bakhoobi shabdo ne ujagar kiya ,hridya ko sparsh karti

Rajey Sha said...

खूबसूरत।

M.A.Sharma "सेहर" said...

उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...

तो...
मैंने देखा उसे
... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...

Speechless here Muflis ji ..!!

Reetika said...

behatreen !!

निर्झर'नीर said...

महावीर ji jaise ucch koti ke rachnakar ne
aapki is najm ke bare mai jo kaha hai yakinan sach kaha hai.

mere paas to shabd nahi bas unke shabdo ko hi mai bhi aapki rachna ke leye udhar leta hun or aapko samarpit karta hun .

kubool karen