Saturday, January 16, 2010

ज़िन्दगी , इंसान को कब किस तरह के इम्तिहान में

डाल दे, कोई सोच भी नहीं सकता .....

आज हम तरक्क़ी की जाने कितनी मंजिलें तयकर चुके हैं ...

फिर भी अपने आप को ढून्ढ पाने में,,,

ख़ुद को ख़ुद से मिलवा पाने में ना-कामयाब ही लगते हैं .....

लेकिन ज़िन्दगी है....जीना है....तो ये सब सुनना है , सहते रहना है ....

एक नज़्म हाज़िर कर रहा हूँ ......



आज भी


दिख रही है .... आज

जाने...कितनी ही किताबों के

अनगिनत पन्नों पर बिखरी

ढेरों..ढेरों... तालीम ...


दिख रही है ... आज

हर तरफ पनप रही

इक-दूसरे से आगे...

बस, आगे निकल जाने की

आपसी होड़ ...


दिख रही है ... आज

आँखों को चुंधियाती

इठलाती , इतराती ,

क़ुदरत का मुहँ चिढ़ाती

बाज़ारी चकाचौंध ....


दिख रही है ... आज

नए बदलाव की ओट लिए

हमारी नई सभ्यता ,
नई तहज़ीब ...


लेकिन ....

इन सब के बावजूद

दिख रहा है ...

आज भी

अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को

पूरा करने की कोशिश में

चलता ,

गिरता ,

थकता ,

टूटता ....

आम आदमी



दिख रहा है

आज भी .......


____________________________________

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32 comments:

MUFLIS said...
This comment has been removed by the author.
मनोज कुमार said...

अच्छा लगा पढकर।

Rekhaa Prahalad said...

अच्छा लगा पढकर2

RC said...

नए बदलाव की ओट लिए

नित नई मिसालों से

पुकारी जाने वाली

हमारी नई सभ्यता ...

badi sachchai hai is rachana mein, Muflis ji.

manu said...

चलेगा मुफलिस जी....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जनाब मुफलिस साहब
......अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को
पूरी करने की कोशिश में
चलता, गिरता, थकता, टूटता ....आम आदमी दिख रहा है ...आज भी
सारगर्भित शब्दों में आम आदमी की व्यथा की शानदार अभिव्यक्ति
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

"अर्श" said...

बेहद खुबसूरत नज़्म... मैं तो यह सोच रहा हूँ के हम क्या कदम दर
कदम तरक्की के तरफ जा रहे हैं या फिर तरक्की से बेहद करीब होते हुए भी दूर जा रहे हैं..

आपका
अर्श

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi sahi ..... bahuy badhiyaa

डॉ टी एस दराल said...

बे-तरतीब-सी तालीम ...
आपसी होड़ ...
बाज़ारी चकाचौंध ....
नई सभ्यता , नई तहज़ीब ...

चलता, गिरता, थकता, टूटता ....आम आदमी

वाह मुफलिस जी। अति संवेदनशील रचना।
जिंदगी की सच्चाइयों को बखूबी उजागर किया है आपने।

दिगम्बर नासवा said...

आज भी अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को पूरी करने की कोशिश में चलता, गिरता, थकता, टूटता ....आम आदमी दिख रहा है ... आज भी .......

साँस है तो जीवन है ... जीवन है तो जीने की रीत भी निभानी है ....... आपका लिखा हमेशा ही जीवन का फ्ल्सफा होता है ....... बहुत कुछ कहता हुवा .........

वन्दना said...

sach kaha ..........aam aadmi to aaj bhi vaise hi ji raha hai jaise hamesha jita aaya hai.......behad prabhavshali rachna.

Apoorv said...

हकीकत बताते खूबसूरत भावों से भरी नज्म

shama said...

दिख रही है .... आज

ढेरों...

ढेरों किताबों के

अनगिनत पन्नों पर बिखरी

बे-तरतीब-सी तालीम ...

Insan ko insan se taqseem karti huee taleem..!
Bahut khoob likha hai! Afreen!

योगेश स्वप्न said...

wah muflis ji, samyik rachna kamal ki hai.

manu said...

पहला कमेन्ट सुबह बड़ी जल्दी में हुआ हुज़ूर...
आधा अधूरा पढ़ कर..ऑफिस जो भागना था...

अब आयें हैं सही से दखने...
किताबों के अनगिनत पन्नों पर बिखरी बे-तरतीब-सी तालीम ...
खूब कहा है...




और ....इन सब के बावजूद दिख रहा है ... आज भी अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को पूरा करने की कोशिश में चलता ,गिरता , थकता , टूटता ....आम आदमी
दिख रहा है

इस ने कहाँ जाना है साहिब....
इस आम आदमी ने तो ताकयामत रहना है....

बल्कि डर है के कहीं क़यामत के बाद भी ना बचा रह जाए....

ज्योति सिंह said...

bahut hi badhiyaa likha hai ,man ko bha gayi rachna .

Vijay Kumar Sappatti said...

sir ji

ye to meri hi katha si hai ..salaam

aur kya kahun abhi ...

Kishore Choudhary said...

मुफलिस साहब बधाई, आपने कविता को जिस खूबसूरती से पूरा किया है उसी जिजीविषा का मैं काईल हूँ.

रचना दीक्षित said...

हम सब इसके शिकार हैं फिर भी यही सब करने को तैयार हैं.सही कहा है

हरकीरत ' हीर' said...

नज़्म अपनी जगह है ....पर आपकी भूमिका के शब्द ..."

ज़िन्दगी , इंसान को कब किस तरह के इम्तिहान में डाल दे, " ....या.... " फिर भी अपने आप को ढून्ढ पाने में,,, ख़ुद को ख़ुद से मिलवा पाने में ना-कामयाब ही लगते हैं ".....आपके भीतर की छुपी ख़ामोशी को बयाँ करते हैं ...क्या है मुफलिस जी हम चाहें मन को कितना भी इधर उधर भटका लें पर हमारी लेखनी किसी न किसी रूप से वह दर्द बयाँ कर ही देती है .....

दिख रही है .... आज

ढेरों...

ढेरों किताबों के

अनगिनत पन्नों पर बिखरी

बे-तरतीब-सी तालीम ...



उस तालीम के तहत ही तो खामोश रहती है जूबां ......!!

kshama said...

और ....इन सब के बावजूद दिख रहा है ... आज भी अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को पूरा करने की कोशिश में चलता , गिरता , थकता , टूटता ....आम आदमी
दिख रहा है
आज भी .......
Nihayat khoobsoorteese apnee baat kahee hai!

'अदा' said...

दिख रही है .... आज

ढेरों...

ढेरों किताबों के

अनगिनत पन्नों पर बिखरी

बे-तरतीब-सी तालीम ...

aapki nazm nahi ye aaj ki haqiqat hai...muflis ji
sundar prastuti..

Dr. Amar Jyoti said...

सुन्दर!

गौतम राजरिशी said...

अच्छी नज़्म गुरुदेव....जो नहीं दिख रहा, उसे बखूबी दिखाती हुई....

नीरज गोस्वामी said...

भाई जान...आपकी नज़्म ने बेजुबान कर दिया...कमबख्त लफ्ज़ ही नहीं मिल रहे तारीफ़ करने के लिए...बहुत देर में आया हूँ ये सोच कर की अब तो कुछ तारीफ़ में लिख पाउँगा लेकिन वाह के आगे बात बढ़ ही नहीं रही...लाजवाब नज़्म...ढेरों बधाई...
नीरज

श्रद्धा जैन said...

दिख रही है ... आज

आँखों को चुंधियाती

इठलाती , इतराती ,

क़ुदरत का मुहँ चिढ़ाती

बाज़ारी चकाचौंध ....



sach kah rahe hain




दिख रही है ... आज

नए बदलाव की ओट लिए

हमारी नई सभ्यता ,
नई तहज़ीब ...

bahut bahut sach

Muflis ji bahut sach kaha hai

ktheLeo said...

शुक्रिया "सच में" पर आने और हौसलाअफ़्ज़ाई करने का.
सुन्दर ख्याल है आपके कलाम में!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या कहूं? शब्द ही नहीं हैं तारीफ़ के लिये.
गणतंत्र दिवस मुबारक हो.

इस्मत ज़ैदी said...

atyadhik sundar abhivyakti hai aaj ke daur ki,bilkul sach kaha apne insan bhag raha hai ye dekhe bina ki kahin is bhag daud men koi kuchal to nahin gaya ,bazar ki chakachaundh men jakda hua hai aaj ka insan ,saamne bahut kuchh hai lekin ye cheezen sukoon ki zaamin nahin.
bahut bahut mubarak ho .

सर्वत एम० said...

यार, २६ जनवरी की मुबारकबाद क्या दूं, सोच कर हंसी आ जाती है. शुक्र है, इसी बहाने हंसने का मौक़ा मिल जाता है.
नज्म आपने भी लिखी, मैं ने भी यही किया. अब अफ़सोस में हूँ. आपकी नज्म वाकई बहुत अच्छी है. बदला मत उतारने लगिएगा. मैं यहाँ तन्हा नहीं, मेरे मित्र, अरविन्द 'असर' भी मौजूद है. बहुत अच्छे गजलकार हैं और लखनऊ में, नई पीढी के जो ४-५ काबिले-ज़िक्र नाम हैं, उनमें सरे-फिहरिस्त हैं.
उनका भी यही कहना है कि मुफलिस साहब ने नज़्म में कमाल कर दिखाया है. इस बात पर मुबारकबाद. अब दो वोट हो गए हैं ना.

hem pandey said...

सुन्दर संवेदनशील रचना के लिए साधुवाद. आम आदमी की नियति भले ही यही हो, इसकी दशा सुधारने का यत्न व्यक्ति, समाज और शासन के स्तर पर किया जाना चाहिए

निर्मला कपिला said...

लेकिन ....

इन सब के बावजूद

दिख रहा है ...

आज भी

अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को

पूरा करने की कोशिश में

चलता ,

गिरता ,

थकता ,

टूटता ....

आम आदमी


आज के आदमी की व्यथा का मार्मिक चित्र शुभकामनायें