Wednesday, December 14, 2011

जीवन में निरंतरता, जीवन की ही द्योतक है, जीवन का ही पर्याय है
प्रत्येक प्रकार की रचना-प्रक्रिया इसीलिए ही संभव हो पाती है
लेकिन रचनात्मकता का प्रभाव, विराम के क्षणों में भी
रहता है....-विराम या विश्राम के पलों का अपना महत्त्व है .
और अब....

शब्दों का एक जुड़ाव-सा हुआ है, प्रस्तुत करा रहा हूँ ...



बस, इतना तो है ही


यूं ही कहीं
तनहाई के किन्हीं खाली पलों में
ख़यालात के कोरे पन्नों पर
जब
खिंचने लगें
कुछ आड़ी-तिरछी सी लक़ीरें
बुन-सा जाए
यादों का इक ताना-बाना
रचने लगे
इक अपनी-सी दुनिया

.... ......
फिर वह सब ...
कोई कविता , गीत , ग़ज़ल
हो न हो...
बस इतना तो है ही
ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .

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19 comments:

kshama said...

ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .
Sach kaha! Warna ham to apne aaap se chhupte phirte hain!

anju(anu) choudhary said...

bahut khub

अरुण चन्द्र रॉय said...

हमेशा की तरह खूबसूरत कविता...

अनुपमा पाठक said...

पूर्णविराम भी बोलते हैं... और कभी कभी शब्दों के बीच की खाली जगहें भी... कुछ कुछ वैसा ही जैसा इस रचना में स्पष्ट है...!!!
शुभकामनाएं!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है ....

एकदम सच कहा सर....
सादर...

डॉ टी एस दराल said...

खुद के लिए भी आराम के दो पल निकालना अत्यंत आवश्यक है ।
खूबसूरत ख्यालात ।

daanish said...

a message received via Email
from res. Ismat Zaidi (Goa)
फिर वह सब ...
कोई कविता , गीत , ग़ज़ल
हो न हो...
बस इतना तो है ही
ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .

बिल्कुल सही कहा आप ने
"विराम या विश्राम के पलों का अपना महत्त्व है ."
इन पलों का मिल पाना और ख़ुद से कभी कभी मुलाक़ात कर पाना ,
आज के वातावरण में अत्यंत कठिन होता जा रहा है ,,
और जब ख़ुद से मुलाक़ात हो जाती है तो किसी न किसी सच्ची रचना का जन्म होता है
बहुत ख़ूब !!

निर्मला कपिला said...

बिलकुल सही कहा और खुद से बतियाना भी बहुत कुछ सिखा देता है। शुभकामनायें।

यादें....ashok saluja . said...

दानिश भाई जी , नमस्कार !
बिल्कुल सही ....
अपने से मुलाकात के लिए ...तन्हाई की जरूरत तो होती ही है ...?
स्वस्थ रहें !

सागर said...

bhaut khub.....

दिगम्बर नासवा said...

जब
खिंचने लगें
कुछ आड़ी-तिरछी सी लक़ीरें
बुन-सा जाए
यादों का इक ताना-बाना
Ye yaadon ka tana bana jaroori hota hai .. Khud ke liye, jeene ke liya ...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सोलह आने सच्ची बात।
..बहुत बधाई।

mridula pradhan said...

ख़ुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .
ekdam theek baat.

सोनरूपा विशाल said...

खुद से मिलना बेहद जरूरी है जिंदगी की भूल भुलैया में .........जिसके पास शब्द हों उसके लिए खुद से मिलने में आसानी तो होती ही है !

सोनरूपा विशाल said...

खुद से मिलना बेहद जरूरी है जिंदगी की भूल भुलैया में .........जिसके पास शब्द हों उसके लिए खुद से मिलने में आसानी तो होती ही है !

रश्मि प्रभा... said...

waah

mahendra verma said...

खुद से मुलाक़ात का
इक बहाना तो हो ही जाता है .

बहुत खूबसूरत बात कह दी आपने।

vidya said...

वाह..
क्या खूबसूरत बात कही..

Reena Babbar said...

bahut hi khoob, rooh mein utarti huyi nazm hai , aapki kuch poetry mere blog ki shobha badha rahi hai , kya karooun itni khoobsurat thi vo nazmein ke bina post kiye nahi raha gaya, maaf kijiyega aapse ijaazat nahi le saki magar unhein aapke naam ke saath post kiya hai, ek baat aapse kehna chahoungi , zaati taur per main ghazalein padhna zyaada pasand nahi karti magar aapki kuch ghazalein padhin , behtareen thiN, magar ghazalon ke muqaable mein aapne nazmein kam likhi hain , plz unhein yun bhuliye nahi , bechaari ghazalon se jealous feel kareingi nazmein :)