Tuesday, December 15, 2009

पिछ्ला हफ्ता दिल्ली और अलवर (राजस्थान)
में गुज़रा ...दिल्ली में डॉ दरवेश भारती ,
श्री प्रेम सहजवाला, श्री जगदीश रावतानी, श्री शैलेश भारतवासी
(सभी ब्लोग्गेर्स ,हिंद-युग्म) से मुलाक़ात का सबब हुआ ....
और अलवर में एक साहित्यिक गोष्ठी में देश के प्रख्यात साहित्यकार
डॉ विनय मिश्र , श्रीमती राज गुप्ता , श्रीमती नीरू , श्री रामचरण राग,
तथा कुछ अन्य (कोई भी ब्लोगर नहीं) ....इन सब से
विचार-विमर्श का सौभाग्य प्राप्त हुआ ....
और अब आप सब से मुखातिब हूँ ....
धीरे-धीरे आप सब की रचनाएं पढ़ना चाहूँगा....
और ये ...आप हज़रातके लिए.....



पहचान



माना !
किन्ही मजबूरियों
और अपनी जिम्मेदारियों को
निभाते रहने की हालत में
मुमकिन नहीं
हर पल ,
हमेशा ,
दूसरों का भला कर पाना
लेकिन......
मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी है ......!!


__________________________

30 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

muflish ji..

namaskar..

bus abhi net par aaya aur dekha ki aap aaye hue hai aur aise aaye hue hai ki kya kahun..

लेकिन......
मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी होगी ......!!


barso beet gaye kuch aisa padhe hue ... kuch aisa jaane hue .. kuch is tarah ke shabdo se mulakhaat kiye hue..

bhai saheb .. main sirf badhayi nahi dena chahta ..kyonki this poem is above anything.. this is the real need of the hour and the real need of mankind..

main aapki kalam se jyada aapki us soch ko salaam karna chahunga ,
jisne is kavita ko janm diya ..

aur bahut kuch kahna chahta hoon ,lekin mere paas aapke jaise acche shabd nahi hai .. sirf itna hi kahna chahunga ki ..ek bhala aadmi ..jiska naam muflish hai ..aaaj mera dost hai...
aur taa-umr mera rahnuma rahenga ..

mera salaam aapkie vazood ko...

aapka
hi chota bhai..

vijay

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी ।

sanjay vyas said...

बढ़िया.सहज पर शाश्वत.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जनाब मुफलिस साहब, आदाब
'कुछ देर', कह रहे हैं, और इतने दिन के बाद 'नज़र' आये हैं आप
चलिये, आप आये, एक भावपूर्ण रचना के साथ, आपका 'स्वागत' है.
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
अपनी कही इन बातों को अब याद ज़रूर रखना
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

'अदा' said...

हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
अगर ये ज़रा सी सोच हर दिन हर इंसान थोड़ी सी देर के लिए भी अपने मन में ले आये तो सोचिये दुनिया का चेहरा कितना बदल जाएगा....
बस ज़रुरत है..हर दिन थोड़ी ही देर के लिए हर इंसान को दिल से इस ख्याल पर अमल करना....
आपकी इस सोच को और उस कलम को सलाम...

आप आये और प्रज्ञा का हौसला बढाया...आपकी आभारी हूँ..ह्रदय से...

योगेश स्वप्न said...

आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी होगी ......!!

sunder rachna ke liye badhaai muflis ji.

वन्दना said...

ek bahut hi gahan aur uttam abhivyakti.........kash aisi soch har insaan ki ho jaye to aman aur shanti hi har taraf nazar aaye.

नीरज गोस्वामी said...

इसे कहते हैं हुनर...वाह...कितने कम शब्दों में कितनी गहरी बात कर गए हैं आप...वाह...जितनी तारीफ़ करूँ कम ही पड़ेगी...
नीरज

डॉ टी एस दराल said...

वाह वाह वाह !
मुफलिस जी, क्या कहने, बहुत ही कम शब्दों में इतनी बड़ी बात कह दी।
इतने दिनों बाद आना हुआ, आपका स्वागत है।

दिगम्बर नासवा said...

आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी होगी ......

कितने सहज ही गहरी बात कह दी आपने ......... आपकी कलाम में ये भि जादू है ....... सच कहा है पहले खुद को पहचाना और फिर अपनी पहचान दूसरों को देना ........... खुद ही करना पड़ता है ............ प्रणाम है मेरा ..........

sada said...

कितनी गहराई लिये हर शब्‍द, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

"अर्श" said...

kya meri shikayat jayaz hai ? ya shayad main is layak nahi ?

:(



arsh

दर्शन said...

Itni Vyastata main bhi agar kum se kum kisi ka bura na karne ki soch hai (behsak bhala karna chaha par kar naa paiye) to sach main is soch ko salam muflis sir.

Identical Soch.
Isliye mujhe bhi salam.
;)

Haan kai dino baad comment karna shuru kiya hai sabse pehle aapse hi shuru.

Wakai kavita ki simplicity Bha gayi.
Aur ismein sacchai (genunity) ki chaap saaf saaf dikh rahi hai.
Par naarajgi to phir bhi kum na hogi meri. (Aap jaante hain kyun?)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही सोच है, सर्वे भवन्तु सुखिनः...

हरकीरत ' हीर' said...
This comment has been removed by the author.
हरकीरत ' हीर' said...

सबसे पहले अलवर की साहित्यिक गोष्ठी में भाग लेने की बधाई .....!!

लगता है ये आपके ब्लोगर मीट का ही करिश्मा है जो दर्पण की टिप्पणी फिर दिखाई देने लगी है .....एक सुकून सा मिला देखकर .....!!

जी हाँ .....
''ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है...."

ऐसी सोच का इंसान ही तो देवता कहलाता है .....!!

mukti said...

मुफ़लिस जी,
मैं पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी और मैंने पहली बार आपकी कविता पढ़ी. मुझे आपकी कविता बहुत अच्छी लगी. इसका कारण है सीधे-सादे शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता. मुझे ऐसी ही सरल भाषा में कही गयी कविता अच्छी लगती है. कुछ ऐसे ही भाव अक्सर उठते हैं मेरे मन में भी और मैं उन्हें लिख लेती हूँ, बिना बनाव-श्रृँगार के...

इस्मत ज़ैदी said...

muflis sahab ,bahut achchhe khayalat hain kaash sab aisa sochen ,is ke pahle wali ghazal ke kuchh sher mujhe bahut pasand aye ,us ghazal ke comment box men isliye nahin likha ki 44 tippaniyon men ye kahin kho na jaye.

सर्वत एम० said...

यह नज्म नहीं, ज़िन्दगी का फलसफा है. जिसने इसे नहीं समझा, उसने अपना जीवन जहन्नम बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. हम, वाकई अगर सिर्फ इस बात को अपनी जिनगी में उतार लें कि किसी का दिल नहीं दुखने नहीं देना है तो शायद ९८% जरायम और गुनाह खत्म हो जाएँ. भाई, आपने बिलकुल सच्चे संतों की वाणी में इस रचना को जन्म दिया है, जिस शख्स का मन आईने की तरह साफ़ होता है, वही ऐसी रचनाओं को जन्म देने में समर्थ है. मैं आपके ख़यालात से न सिर्फ इत्तिफाक रखता हूँ बल्कि सर झुकाता हूँ इन मुकद्दस लफ्जों की शान में. मुबारकबाद देता हूँ इस लिए कि इंसानियत का यह फलसफा न सिर्फ आपने समझा, बल्कि दूसरों तक पहुँचाया. खुदा आपके ख़यालात दूसरों के मन में भी पैदा करे-आमीन.

shama said...

मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी है ......!!

Kitnaa sach hai! Kaash har wyakti is baatpe amal kare!

निर्मला कपिला said...

मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है
आख़िर.....
ख़ुद को
अपनी पहचान
हमें ख़ुद ही देनी होगी ......!!
बस ये बात अगर हर कोई समझ ले जान ले तो दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाये। आपकी कविता कहानियों से प्रेरणा लेती हूँ। ये ब्लाग भी क्या नयामत है रहते तो हम एक ही सूबे मे मगर अब लगता है जैसे एक ही शहर मे रहते हैं। अखिर सही बात कही है किसी ने * अपने तो अपने होते हैं* कितने भी कमेन्ट मुझे मिलें मगर जो अपनापन आप्के शब्दों मे लगता है वि शायद और किसी के शब्दों मे नहीं बहुत बहुत धन्यवाद जो आप इस अल्पग्य को प्रेरणा देते हैं । आदमी उमर से बडा नहीं होता अप अपनी काबलियत से मुझ से बडे हैं। बेशक उमर से मैं बडी हूँ। धन्यवाद आपका फिर से और शुभकामनायें

Mrs. Asha Joglekar said...

मुमकिन है यह
हर पल ,
हमेशा ,
ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना
बहुत सुंदर ।

hem pandey said...

कविता के माध्यम से आपने इंसानियत की व्याख्या कर डाली.साधुवाद.

RC said...

bahut khoob... aakhri chand panktiyon mein jo saar hai wah to ...!

God bless!
RC

रचना दीक्षित said...

बहुत गहरी बात.बहुत अच्छी lagi . bhagwan gavah है main isi vichar dhara को maanti हूँ और manati हूँ की bhagwan mere dushman को भी kasht naa de

kshama said...

"Simate Lamhen " blogpe aapkee zaraanawazee aur hausala afzaayi ke liye tahe dilse shukriya!

गौतम राजरिशी said...

विनय मिश्र जी की ग़ज़लें तो खूब पढ़ी हैं। गोष्ठी का ब्योरा तनिक विस्तार से मिलता तो मजा आ जाता। दरवेश साब नहीं गये क्या संग में?

कविता के बारे में क्या कहूं...आप तो बेमिसाल हैं।

ज्योति सिंह said...

ख़याल रखना इस बात का
किसी का दिल न दुखने पाए
किसी का बुरा न होने पाए ...
अपनी कही इन बातों को अब याद ज़रूर रखना
bahut sahi kaha aapne

manu said...

kavita ke bhaav sunder hain ..

aur us din ki baat...:(

:(

ye milnaa bhi koi milnaa thaa muflis ji...??

darpan ko to yakeen bhi nahi huaa thaa....
ke mulaakaat ho bhi chuki

निर्झर'नीर said...

किसी का बुरा न होने पाए ...
ऐसी कोशिशें
करते रहना भी तो
दूसरों का
भला कर पाने के समान ही है


yakinan saargarbhit rachna daad ki haqdaar