Monday, February 15, 2010

ज़िन्दगी जुर्म सही, जब्र सही, ग़म ही सही ...

जाने क्यूं आज सुमन कल्यानपुर का गाया ये गीत

अचानक ज़बाँ पर आ गया...आप सब ने भी सुना ही होगा

बस यूं ही सांझा करने को जी चाहा .....

एक नज़्म-नुमा कुछ ताना-बाना-सा हुआ है

आप मेहरबान दोस्तों को आदत तो है ही ...सह लेने की ....

सो...क़ुबूल फरमाईये



आज फिर



आज

आज फिर...

वो अपने आप-सा

उदास-सा दिखा

आज फिर

कुछ भी तो

अपनी तरह से न हो पाने पर...

वो झुंझलाया

आज फिर

अपने अकेलेपन के एहसास से झगड़ते हुए

हालात की तल्ख़ी से हार कर ...

वो कसमसाया

आज फिर

माहौल के खालीपन को गले लगा

ख़ुद से बात करने की कोशिश में

अचानक

वो उठा...

अपनी पलकों के कोनों पर उभर आये

चन्द क़तरों को दर्पण में निहारा

और....

हँस दिया .....

...................

आज फिर ....

32 comments:

MUFLIS said...
This comment has been removed by the author.
शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जनाब मुफ़लिस साहब, आदाब
वो अपने आप-सा....उदास-सा दिखा...आज फिर...
कुछ भी तो...अपनी तरह से न हो पाने पर...
वो झुंझलाया...आज फिर
....अपनी पलकों के कोनों पर उभर आये
चन्द क़तरों को दर्पण में निहारा
और....हँस दिया .....आज फिर ....
क्या खूब कहा है, जनाब
मुबारकबाद

योगेश स्वप्न said...

bahut khoob muflis ji, kya khoob dard ko abhivyakt kiya hai................lajawaab.

डॉ टी एस दराल said...

वाह मुफलिस जी , एकाकीपन के दर्द को इतनी खूबसूरती से पेश किया है की आखों में आंसू आने को मुश्किल से रोक पाए हैं।
रिश्तों पर एक मासूम सा सवाल हमने भी उठाया है , वैलेंटाइन डे पर।

Vijay Kumar Sappatti said...

muflis saheb... kya kahun aapne nitaant ekaant ke kshano ko itne behatar dhang se darshaaya hai ki , kuch kah nahi paa raha hoon.. hum sab kisi na kisi format akele hote hai ..

mukti said...

कितने सरल शब्दों में इतनी गहरी बातें कह देते हैं आप.

डिम्पल said...

हर दिल यहाँ बेताब है मालूम नहीं क्यूँ..
हर आँख में सैलाब है मालूम नहीं क्यूँ...

कंचन सिंह चौहान said...

Beautifulllllll.....

दिगम्बर नासवा said...

आज फिर
कुछ भी तो अपनी तरह से न हो पाने पर...
वो झुंझलाया ..

अपनी मर्ज़ी कहाँ अपने सफ़र के हम हैं .... बस यूँ ही आपकी नज़्म पढ़ कर गुनगुना बैठा ...... सच है अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नही कर पाता इंसान .... बस आदतन झुंझला ही सकता है ... बहुत अच्छा मुफ़लिस जी .... लंबे समय बाद आप कुछ लिखते हैं पर बहुत ही लाजवाब ... कमाल का लिखते हैं ....

रश्मि प्रभा... said...

उदास-सा दिखा

आज फिर

कुछ भी तो

अपनी तरह से न हो पाने पर...

वो झुंझलाया

आज फिर

अपने अकेलेपन के एहसास से झगड़ते हुए

हालात की तल्ख़ी से हार कर ...
.........
bahut hi badhiyaa,dil ke kareeb

हरकीरत ' हीर' said...

मेरी तन्हाइयो तुम ही लगा लो मुझको सीने से
के मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो-रो के जीने से

वन्दना said...

main, mere ahsaas aur meri tanhaiyan
aur kya chahiye jeene ke liye

is soch ko bakhubi ubhara hai......dil ko chhoo gayi.

निर्मला कपिला said...

मैं तो निशब्द हूँ------ पता नही क्यों ----होता है कई बार ऐसे--- शुभकामनायें

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुंदर.

इस्मत ज़ैदी said...

जज़्बात को अलफ़ाज़ का जामा पहना कर नज़रों के सामने ला खड़ा किया है आप ने ,इंसान की ख़ुद से जंग aur फिर हालात को वैसे ही क़ुबूल करने की मजबूरी , बहुत खूब

Razi Shahab said...

nice

M.A.Sharma "सेहर" said...

अपने आप से बातें करना , अपने आप को पहचानना, ...खुद से मिलकर बातें करना अच्छा लगता है...

अति सुन्दर

"अर्श" said...

मैं शायद खुद को पढ़ रहा था....

आभार

अर्श

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मुफ़लिस साहब, एक आम आदमी की परेशानी, उसकी व्यथा और उसकी मानसिकता को इतनी खूबसूरती के साथ उकेरा है आपने कि शब्द-श्ब्द जीवन्त हो उठे हैं.बधाई.

अल्पना वर्मा said...

'ज़िन्दगी जुर्म सही,
जब्र सही, ग़म ही सही ,
दिल की फरियाद सही ,
रूह का मातम ही सही..'
कितना खूबसूरत भूला बिसरा सा एक गीत याद दिला दिया.
-दिल की आह से जन्मी यह नज़्म आँखों में नमी और होठों पर मुस्कान लिए चलने वाले का दर्द बखूबी बयान कर रही है.

गौतम राजरिशी said...

आज फिर दिल ने कुछ तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया...

kumar zahid said...

आज फिर

माहौल के खालीपन को गले लगा

ख़ुद से बात करने की कोशिश में

Nice vision cogra---

Babli said...

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! बढ़िया लगा!

psingh said...

sundar rachna
abhar....

singhsdm said...

मुफ़लिस साहब

....अपनी पलकों के कोनों पर उभर आये
चन्द क़तरों को दर्पण में निहारा
और....हँस दिया .....आज फिर ....

क्या खूब कहा है
मुबारकबाद

सर्वत एम० said...

क्या कह दिया? मेरे पास तो शब्द ही नहीं रह गए कुछ कहने को. आप अपना तखल्लुस बदलें. ये मुफलिस के जज्बात हो ही नहीं सकते. ये तो बेहद मालदार शख्सियत के ख़यालात हैं. पैसों से नहीं, फ़िक्र और शऊर से मालामाल शख्सियत.
मैं इधर मसरूफ हूँ, कुछ ज्यादा ही. किसी ब्लॉग पर जाने की हैसियत ही नहीं बन रही है. आपने भी राबता बंद कर रखा है. शायद मसरूफियत आप को भी घेरे हुए है.
इतना अच्छा लिख रहे हैं आप, मुझे अपना लिखना बंद करना जायज़ लग रहा है.

भूतनाथ said...

ek baar phir yahaan aakar badaa mazaa aaya.....har ik harf ne dil ko badaa lubhaya...!!

रचना दीक्षित said...

हर दिल यहाँ बेताब है मालूम नहीं क्यूँ..
हर आँख में सैलाब है मालूम नहीं क्यूँ...




आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

Mrs. Asha Joglekar said...

मुफलिस जी बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आई और आना वसूल हुआ ।
आज फिर
वो अपने आप-सा....उदास-सा दिखा...
आज फिर...
कुछ भी तो...अपनी तरह से न हो पाने पर...
वो झुंझलाया...आज फिर....
बेहद खूबसूरत रचना । अकेलेपन के और असफलता के दर्द को उभारती हुई ।

लेकिन कोई कोई दिन ऐसा भी होता है जब सब कुछ आपके मन माफिक होता चला जाता है वो बी आपके बिना कोशिश किये, कम होता है पर होता तो है ।

'अदा' said...

Muflis ji,
bahut hi saral bhasha mein bahut hi gahri baat kahne ki kala aapko aati hai..
bahut hi sundar rachna..
aabhar..

manu said...

आपकी कविता..
हरकीरत जी का शे'र..
मेज़र साब का गीत...सब मिलकर एक बेचैनी सी पैदा कर रहे हैं...हजल पढ़कर निचे आये है तो सारी मस्ती हवा हो चुकी है...

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com