Saturday, July 9, 2011

मन के भावों को शब्दों के हवाले किये जाने तक की
कशमकश में खुद से रुबरु होना तो तय होता ही है ,
अपने आस-पास को भी खुद तक ला पाने का काम
कर लेना
भी लाज़िम होता रहे तो इक लय बनी रहती है
कुछ, जाने-पहचाने-से
अश`आर, ग़ज़ल की शक्ल में
हाज़िर हैं ......



ग़ज़ल


रहे क़ायम, जहाँ में प्यार , प्यारे
फले - फूले ये कारोबार प्यारे

सुकून-औ-चैन की ही खुशबुएँ हों
सदा खिलता रहे गुलज़ार प्यारे

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से
सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे

लहू का रंग सबका एक-सा है
तो फिर आपस में क्यूँ तकरार प्यारे

महोब्बत की तड़प में भी मज़ा है
सुकूँ देता है ये आज़ार प्यारे

किसी को क्या पड़ी, सोचे किसी को
सभी अपने लिए बीमार, प्यारे

तुम्हें जी-भरके अपना प्यार देगी
करो तो, ज़िन्दगी से प्यार, प्यारे

यही है फलसफा-ए-इश्क़ , 'दानिश',
जो डूबा है, वही है पार, प्यारे


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गुलज़ार=बग़ीचा
शुऊरएज़िन्दगी= जीने का सलीक़ा
तस्लीम=स्वीकार
आज़ार= रोग
फलसफा=सिद्धांत, दर्शन

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38 comments:

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हें जी-भरके अपना प्यार देगी
करो तो, ज़िन्दगी से प्यार, प्यारे
waah

vaishnavi said...

jindagi ka falsafa payar hai payare,payar payar mai aapne payari si jaindgi ko alfaazo mai ji liya. payari si gazal!

रविकर said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति ||
बधाई ||

अरुण चन्द्र रॉय said...

खूबसूरत ग़ज़ल... हर शेर मुक्कमल...

मनोज कुमार said...

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे
एक-एक शे’र में जबर्दस्त आकर्षण है। बहुत अच्छी लगी यह ग़ज़ल।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे

दानिश जी ,
शिकायत बस दूसरों से ही रहती है ..इसे आपने बखूबी लिखा है ..सुन्दर गज़ल

यादें said...

दानिश जी ,
खूबसूरत ख्वाइशें!!!

खुश रहें,खुश रखें !
शुभकामनायें!

मीनाक्षी said...

लहू का रंग सबका एक-सा है
तो फिर आपस में क्यूँ तकरार प्यारे --- काश इस क्यों का जवाब होता...!!

Kunwar Kusumesh said...

ग़ज़ल भी अच्छी और सन्देश भी अच्छा.
बधाई दानिश भाई.

Vijay Kumar Sappatti said...

aap to dil jeet lete hai huzoor ... aapki gazal ka kya kahna .. main to aap ke gazal me chipe bhaavo par fida hoon ....

Jigar Joshi "PREM" said...

bahot khub

दिगम्बर नासवा said...

तुम्हें जी-भरके अपना प्यार देगी
करो तो, ज़िन्दगी से प्यार, प्यारे ...

एक शेर को कोट कर रहा हूँ पर सच कहूँ तो सभी शेर इतने लाजवाब और कमाल के हैं ... की हर शेर पढ़ने के बाद लगता है क्या कह दिया है .. वो भी आसान से शब्दों में ...

Manish Kumar said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

bilkul sahi kaha aapne.

डॉ टी एस दराल said...

हर एक शे'र खूबसूरत .

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

यह तो कमाल का है .

निवेदिता said...

प्रभावित करती अभिव्यक्ति ..... आभार !

S.M.HABIB said...

इस खुबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको सादर नमन...
(इस गुस्ताखी के लिए मुआफी की दरख्वास्त सहित)

"हकाइक-ए-हयात का बयान-ए-मुकम्मल
वसील-ए-इन्शिराहे क़ल्ब, ये अशआर प्यारे"
सादर...

नीरज गोस्वामी said...

इस खूबसरत ग़ज़ल और ज़ज्बे के लिए तहे दिल से बधाई ...काश ऐसा ही हो जाय...ज़िन्दगी चैन से जीने के तरीके सिखा रही है आप की ये ग़ज़ल...

नीरज

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

अच्छा सन्देश देती..........सुन्दर ग़ज़ल
हर शेर अर्थपूर्ण

ehsas said...

हमेशा की तरह एक शानदार रचना। बेहतरीन गजल। आभार।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

खूबसूरत रचना। अपनी दुआ में हमें भी शामिल समझिये।

गौतम राजरिशी said...

"हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे"

...इस शेर के अंदाज़े-बयां के क्या कहने दानिश साब!!! नमन!

कल आपका कॉल छूट गया, जिसका अफसोस है...आज रात बात होगी|

Navin C. Chaturvedi said...

आप से ऐसी ही खूबसूरत गज़लों की उम्मीद है रहती है दानिश भाई| मजा आ गया इसे पढ़ कर| ये मिसरे दिल के काफी क़रीब लगे:-
कभी खुद से भी हो दो चार प्यारे ............
सुकूँ देता है ये आज़ार प्यारे ……
करो तो ज़िंदगी को प्यार प्यारे............
और मकते की तो बात ही निराली रही ............... जो डूबा है, वही है पार प्यारे|
मजा आ गया| कल आप से हुई बात के मुताबिक अपनी पिछली दो गज़लों की लिंक यहीं दे रहा हूँ|


नवरस ग़ज़ल - हाथ में आटा लिए जो गुनगुनाये ज़िंदगी

ग़ज़ल: जब वो खुद को तलाश लें, खुद में

कुण्डलिया छन्द - सरोकारों के सौदे

lahr lahr ghazalganga said...

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे

लहू का रंग सबका एक-सा है
तो फिर आपस में क्यूँ तकरार प्यारे

अच्छे शेर, कामयाब ग़ज़ल...ढेरों दाद क़ुबूल करें

---देवेंद्र गौतम

इस्मत ज़ैदी said...

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे


लहू का रंग सबका एक-सा है
तो फिर आपस में क्यूँ तकरार प्यारे

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल ,,ये बातें ,ये नसाएह अगर हम समझ सकें और इन पर अमल भी कर सकें तो दुनिया का एक अलग ही चेहरा नज़र आएगा ख़ूबसूरत और पुरकशिश

Vishal said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

शुऊर-ए-ज़िन्दगी फूलों से सीखो
करो तस्लीम हँस कर ख़ार प्यारे

लाजवाब!!!!
बहुत अच्छी ग़ज़ल।

dheer said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे


kyaa hee khoobsoorat sher hai!

hazaar_haa daad!

Parasmani said...

आमीन

अगर ये फलसफा समज़ में आ जाये और याद भी रहे तो बेडा पार हो जाए..."दानिश" जी ...

False info said...

दानिश जी,

प्रभावित करती खूबसूरत ग़ज़ल

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे...
शुभकामनायें!

डॉ. हरदीप संधु said...

दानिश जी,

प्रभावित करती खूबसूरत ग़ज़ल

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे...
शुभकामनायें!

Rajeev Bharol said...

वाह. बहुत प्यारी गज़ल है. खूबसूरत मतला और एक से बढ़ कर एक शेर..

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे.. वाह.

दाद कबूल फरमाएं.

मीनाक्षी said...

बहुत खूब....एक एक शेर सन्देश देता हुआ... काश कुछ अमल कर लें हम.....

मीनाक्षी said...

बहुत खूब....एक एक शेर सन्देश देता हुआ... काश कुछ अमल कर लें हम.....

aarkay said...

dk जी , आपने तो गागर में सागर भर दिया ! विशेष कर :

" यही है फलसफा-ए-इश्क़ , 'दानिश',
जो डूबा है, वही है पार, प्यारे "

सब बातों का निचोड़ है !
बधाई !

पारुल "पुखराज" said...

जो डूबा है, वही है पार, प्यारे

bahut badhiya

Khusrau darya prem ka, ulti wa ki dhaar,
Jo utra so doob gaya, jo dooba so paar.

Mrs. Asha Joglekar said...

जियो खुद, और जीने दो सभी को
यही हो ज़िन्दगी का सार प्यारे

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे

दानिश जी बहुत ही खूबसूरत गज़ल शारे शेर कमाल के हैं चुनना मुश्किल था ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे
वाह दानिश साहब, वैसे तो ग़ज़ल का हर शेर बहुत अच्छा है, लेकिन यह शेर हासिले-ग़ज़ल है.

अल्पना वर्मा said...

हमेशा ही ज़माने से शिकायत ?
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार, प्यारे
----
तुम्हें जी-भरके अपना प्यार देगी
करो तो, ज़िन्दगी से प्यार, प्यारे

क्या कहने! बहुत खूब..रोशनी बिखरते हुए ये सभी अश`आर बहुत पसंद आये.
आप किकही यह बात --मन के भावों को शब्दों के हवाले किये जाने तक की कशमकश में खुद से रुबरु होना तो तय होता ही है--बहुत सही लगी.इसे एक शायर ही समझ सकता है.

अंकित "सफ़र" said...

बहुत उम्दा शेर कहें हैं, मुहब्बत की तड़प में भी मज़ा है......, किसी को क्या पड़ी, सोचे किसी को.....

इस शेर के तो कहने ही क्या.....
हमेशा ही ज़माने से शिकायत
कभी ख़ुद से भी हो दो-चार,प्यारे