प्रकृति के क़रीब होना, अपने-आप के क़रीब होना ही है
क़ुदरत खिलखिलाती है मानो ज़िन्दगी खिलखिलाती है
खुले आसमान में आज़ादी से उड़ते परिंदे हर बार
अपनी मासूम ज़बान में किसी ना किसी
रूप में कोई ना कोई अच्छा पैग़ाम दे ही जाते हैं....
ख़ैर,,, एक नज़्म हाज़िर-ए-ख़िदमत है .........
नन्ही चिड़िया
रोज़ सुबह
भोर के उजले पहर में
सूरज की मासूम किरणों सँग
मेरे घर की तन्हा मुंडेर पर
वक्त की पाबंदी
और
फ़र्ज़ की बंदिशों से बेख़बर
इक नन्ही-सी चिड़िया
यहाँ-वहाँ बिखरा
दाना-दुनका चुगती
उडती ,
फुदकती ,
चहचहाती है
शुक्र अल्लाह !!
आज ऐसी भीड़ में भी
ज़िन्दगी...
कुछ पल ही सही
हँसती ,
खेलती ,
मुस्कराती है ...
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Sunday, June 19, 2011
Tuesday, May 31, 2011
कई बार, ज़हन में समाई कुछ पुरानीयादें
और कागज़ के किन्हीं टुकड़ों पर लिखी रह गईं कुछ तहरीरें
अचानक आवाज़ देने लगतीं हैं...बिसरी यादों पर भले ही
कोई बस न चल पाए,, लेकिन कुछ लिखतें तो क़ाबू में आ ही
जाती हैं... एक पुरानी ग़ज़ल, जिसके कुछ शेर आप पहले भी
पढ़ चुके होंगे,,, कुछ तरमीम /संशोधन के बाद फिर से आपसे
साँझा कर रहा हूँ... ... ... ...
ग़ज़ल
हर मुखौटे के तले एक मुखौटा निकला
अब तो हर शख्स के चेहरे ही पे चेहरा निकला
आज़माईश तो ग़लत- फ़हमी बढ़ा देती है
इम्तिहानों का तो कुछ और नतीजा निकला
दिल तलक जाने का रस्ता भी तो निकला दिल से
वो शिकायत तो फ़क़त एक बहाना निकला
कोई सरहद न कभी रोक सकी रिश्तों को
ख़ुशबुओं पर, न कभी कोई भी पहरा निकला
रोज़ सड़कों पे गरजती हुई दहशत-गर्दी
रोज़, हर रोज़ शराफ़त का जनाज़ा निकला
तू सितम करने में माहिर, मैं सितम सहने में
ज़िन्दगी ! तुझसे तो रिश्ता मेरा गहरा निकला
यूँ तो काँधों पे वो इक भीड़ लिये फिरता है
ग़ौर से देखा, तो हर शख्स ही तनहा निकला
रंग कोई है ज़माने का, न दुनियादारी
लोग सब हँसते हैं, 'दानिश' तू भला क्या निकला
और कागज़ के किन्हीं टुकड़ों पर लिखी रह गईं कुछ तहरीरें
अचानक आवाज़ देने लगतीं हैं...बिसरी यादों पर भले ही
कोई बस न चल पाए,, लेकिन कुछ लिखतें तो क़ाबू में आ ही
जाती हैं... एक पुरानी ग़ज़ल, जिसके कुछ शेर आप पहले भी
पढ़ चुके होंगे,,, कुछ तरमीम /संशोधन के बाद फिर से आपसे
साँझा कर रहा हूँ... ... ... ...
ग़ज़ल
हर मुखौटे के तले एक मुखौटा निकला
अब तो हर शख्स के चेहरे ही पे चेहरा निकला
आज़माईश तो ग़लत- फ़हमी बढ़ा देती है
इम्तिहानों का तो कुछ और नतीजा निकला
दिल तलक जाने का रस्ता भी तो निकला दिल से
वो शिकायत तो फ़क़त एक बहाना निकला
कोई सरहद न कभी रोक सकी रिश्तों को
ख़ुशबुओं पर, न कभी कोई भी पहरा निकला
रोज़ सड़कों पे गरजती हुई दहशत-गर्दी
रोज़, हर रोज़ शराफ़त का जनाज़ा निकला
तू सितम करने में माहिर, मैं सितम सहने में
ज़िन्दगी ! तुझसे तो रिश्ता मेरा गहरा निकला
यूँ तो काँधों पे वो इक भीड़ लिये फिरता है
ग़ौर से देखा, तो हर शख्स ही तनहा निकला
रंग कोई है ज़माने का, न दुनियादारी
लोग सब हँसते हैं, 'दानिश' तू भला क्या निकला
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Sunday, May 8, 2011
पहले से दिए गए निर्धारित वाक्य (तरही मिसरा)
"उसका पावन मन देखा है" के लिए बरेली के वरिष्ठ साहित्यकार
श्री शिवनाथ बिस्मिल जी द्वारा "नई लेखनी" के प्रवेशांक के लिए
गज़लें मंगवाई गईं थीं... उस अंक में कुछ ब्लोगर साथियों की भी
बहुत अच्छी गज़लें प्रकाशित हुई हैं
इसी सिलसिले में कही गयी ग़ज़ल के कुछ शेर
आपकी खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ.......
ग़ज़ल
हर पल है अड़चन , देखा है
ये जग इक बंधन देखा है
सुन्दर प्रेम-सपन देखा है
जीवन अभिनन्दन देखा है
अनसुलझे कुछ प्रश्न मिले हैं
जब जब मन-दरपन देखा है
इस दुनिया की, दिल वालों से
रहती है अनबन , देखा है
दिल बँट जाने से ही अक्सर
बँटता घर-आँगन देखा है
मेहनत और लगन का ही तो
दुनिया में वंदन देखा है
आस-निराश भरे पथ पर ही
जीवन परिचालन देखा है सीख न पाया तौर जफ़ा के
हाँ , तुझ-सा भी बन देखा है
लागी नाहीं छूटे रामा
कर-कर लाख जतन देखा है
"दानिश" प्रेम-बिना जग सूना
है अनमोल कथन , देखा है
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Tuesday, April 12, 2011
नमस्कार
इस बार फिर वक़्त के इस बड़े फासले को मैं मिटा नहीं पाया
पता नहीं कैसे, दूरियों और मजबूरियों में इक अजब-सा रिश्ता पनप उठता है
इस बीच आप सब मित्रों को पढ़ते रहना तो होता ही रहा
लीजिये... एक ग़ज़ल आपकी खिदमत में हाज़िर करता हूँ
ग़ज़ल
ख़ुशी में , ख़ुशी से गुज़र हो गई
नहीं ग़म , अगर आँख तर हो गई
किसी की नज़र हमसफ़र हो गई
बड़ी खुशनुमा रहगुज़र हो गई
उसे ही मिले ज़िंदगी के निशाँ
ख़ुद अपनी जिसे कुछ ख़बर हो गई
शराफ़त तो है इक कमी आजकल
मगर जालसाज़ी, हुनर हो गई
ग़म ए यार मेहमाँ हुआ रात-भर
'ज़रा आँख झपकी, सहर हो गई'
बशर, दायरों में ही बँटता गया
नज़र , हर नज़र , कम-नज़र हो गई
बस इक आरज़ू थी , बस इक इंतज़ार
हयात इस क़दर मुख़्तसर हो गई
भुला दूँ उसे, जब ये मांगी दुआ
न फ़रियाद क्यूँ बे-असर हो गई
कभी कुछ दिलासे , कभी कुछ भरम
बस ऐसे ही 'दानिश' बसर हो गई
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आँख तर = भीगी हुई आँखें
हयात = ज़िंदगी
मुख़्तसर = संक्षिप्त , (यहाँ) सिमट चुकी
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Sunday, March 13, 2011
रंगों और उमंगों के त्यौहार होली की आमद है
नफ़रत और बैर-भाव बाक़ी ना रहे,, लोगों में अम्नो-अमान
और आपसी भाईचारा बना रहे...इन्ही दुआओं के साथ
आप सब को ढेरों मुबारकबाद ।
ग़ज़ल
जब करें वो , जीत की या हार की बातें करें
लोग, अब तो जंग की , हथियार की बातें करें
क्या ज़रूरी है कि हम तक़रार की बातें करें
आ, कि मिल बैठें कभी, कुछ प्यार की बातें करें
रंग होली के , बसंती राग , बैसाखी का ढोल ,
मौसमों का ज़िक्र हो , त्यौहार की बातें करें
वक़्त है , फुर्सत भी है , मौक़ा भी है , दस्तूर भी
अब चलो, दिल खोल कर दिलदार की बातें करें
ज़िन्दगी के साज़ पर छेड़ें तराने हम नए
गीत की, संगीत की , झंकार की बातें करें
इस बदलते दौर में हम क्यों रहें पीछे भला
वक़्त के साथी बनें , रफ़्तार की बातें करें
अब फ़क़त ये आस, लफ़्ज़ों तक न रह जाए कहीं
ख़्वाब सच्चे हों , इसी आसार की बातें करें
है यही वाजिब कि 'दानिश' ज़िक्र-ए-जन्नत छोड़ कर
हम इसी दुनिया , इसी संसार की बातें करें
------------------------------------------------
तकरार=झगड़ा
वाजिब=उचित
ज़िक्र-ए-जन्नत= स्वर्ग(काल्पनिक) लोक की चर्चाएं
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नफ़रत और बैर-भाव बाक़ी ना रहे,, लोगों में अम्नो-अमान
और आपसी भाईचारा बना रहे...इन्ही दुआओं के साथ
आप सब को ढेरों मुबारकबाद ।
ग़ज़ल
जब करें वो , जीत की या हार की बातें करें
लोग, अब तो जंग की , हथियार की बातें करें
क्या ज़रूरी है कि हम तक़रार की बातें करें
आ, कि मिल बैठें कभी, कुछ प्यार की बातें करें
रंग होली के , बसंती राग , बैसाखी का ढोल ,
मौसमों का ज़िक्र हो , त्यौहार की बातें करें
वक़्त है , फुर्सत भी है , मौक़ा भी है , दस्तूर भी
अब चलो, दिल खोल कर दिलदार की बातें करें
ज़िन्दगी के साज़ पर छेड़ें तराने हम नए
गीत की, संगीत की , झंकार की बातें करें
इस बदलते दौर में हम क्यों रहें पीछे भला
वक़्त के साथी बनें , रफ़्तार की बातें करें
अब फ़क़त ये आस, लफ़्ज़ों तक न रह जाए कहीं
ख़्वाब सच्चे हों , इसी आसार की बातें करें
है यही वाजिब कि 'दानिश' ज़िक्र-ए-जन्नत छोड़ कर
हम इसी दुनिया , इसी संसार की बातें करें
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तकरार=झगड़ा
वाजिब=उचित
ज़िक्र-ए-जन्नत= स्वर्ग(काल्पनिक) लोक की चर्चाएं
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Saturday, February 19, 2011
पिछले दिनों आदरणीय श्री पंकज सुबीर जी केब्लॉग पर
एक तरही मिसरा मश्क़ के लिये दिया गया था,,
"नए साल में नए गुल खिलें, नयी खुशबुएँ नए रंग हों"
मिसरा अपने आप में बहुत अनूठा रहा, मन में समा जाने वाला..
इसी मिसरे को लेकर कुछ शेर हो गये हैं
जो आप सब की खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ.......
ग़ज़ल
हों बुझे-बुझे, कि खिले-खिले, वो बने रहें, या कि भंग हों
तेरी सोच के सभी सिलसिले, तेरे अपने मन की तरंग हों
तेरी ज़िंदगी, हो वो ज़िंदगी, जो किसी के काम भी आ सके
तू बने, तो ऐसा उदाहरण , चहुँ ओर तेरे प्रसंग हों
है पड़ोसी वो, तो भले पड़ोसी का फ़र्ज़ भो तो निभाए वो
न करे कुछ ऐसी वो हरक़तें, जो हमेशा बाईस-ए-जंग हों
यही चाहते हैं सब आजकल , है हवा जिधर की, उधर चलो
न तो ज़िंदगी में हों क़ायदे , न उसूल कोई, न ढंग हों
यूँ फ़रोग़-ए-इल्म के वास्ते, जो कभी भी कोई कहे ग़ज़ल
यही इल्तेजा है मेरे ख़ुदा, न रदीफ़-ओ-क़ाफ़िये तंग हों
मेरे स्वप्न शिल्प में जब ढलें , मेरा शब्द-शब्द सृजन रचे
मिले कल्पना को इक आकृति, भले भाव मन के अनंग हों
चलो 'दानिश' अब ये दुआ करें , हों सभी दिलों में ये ख्वाहिशें
हो कोई भी दुःख, सभी साथ हों, हो कोई ख़ुशी, सभी संग हों
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प्रसंग=चर्चे/वार्तालाप
बाईस-ए-जंग=युद्ध/झगड़े का कारण
फरोग-ए-इल्म=ज्ञान वृद्धि/विद्या प्रसार
रदीफ़-ओ-क़ाफिये=ग़ज़ल की व्याकरण से सम्बंधित घटक
(तुकांत इत्यादि)
अनंग=देह रहित/बिना श़क्ल
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एक तरही मिसरा मश्क़ के लिये दिया गया था,,
"नए साल में नए गुल खिलें, नयी खुशबुएँ नए रंग हों"
मिसरा अपने आप में बहुत अनूठा रहा, मन में समा जाने वाला..
इसी मिसरे को लेकर कुछ शेर हो गये हैं
जो आप सब की खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ.......
ग़ज़ल
हों बुझे-बुझे, कि खिले-खिले, वो बने रहें, या कि भंग हों
तेरी सोच के सभी सिलसिले, तेरे अपने मन की तरंग हों
तेरी ज़िंदगी, हो वो ज़िंदगी, जो किसी के काम भी आ सके
तू बने, तो ऐसा उदाहरण , चहुँ ओर तेरे प्रसंग हों
है पड़ोसी वो, तो भले पड़ोसी का फ़र्ज़ भो तो निभाए वो
न करे कुछ ऐसी वो हरक़तें, जो हमेशा बाईस-ए-जंग हों
यही चाहते हैं सब आजकल , है हवा जिधर की, उधर चलो
न तो ज़िंदगी में हों क़ायदे , न उसूल कोई, न ढंग हों
यूँ फ़रोग़-ए-इल्म के वास्ते, जो कभी भी कोई कहे ग़ज़ल
यही इल्तेजा है मेरे ख़ुदा, न रदीफ़-ओ-क़ाफ़िये तंग हों
मेरे स्वप्न शिल्प में जब ढलें , मेरा शब्द-शब्द सृजन रचे
मिले कल्पना को इक आकृति, भले भाव मन के अनंग हों
चलो 'दानिश' अब ये दुआ करें , हों सभी दिलों में ये ख्वाहिशें
हो कोई भी दुःख, सभी साथ हों, हो कोई ख़ुशी, सभी संग हों
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प्रसंग=चर्चे/वार्तालाप
बाईस-ए-जंग=युद्ध/झगड़े का कारण
फरोग-ए-इल्म=ज्ञान वृद्धि/विद्या प्रसार
रदीफ़-ओ-क़ाफिये=ग़ज़ल की व्याकरण से सम्बंधित घटक
(तुकांत इत्यादि)
अनंग=देह रहित/बिना श़क्ल
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Tuesday, February 1, 2011
पिछ्ला बहुत सारा वक़्त साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वती-सुमन'
के ग़ज़ल विशेषांक की देख रेख में ही गुज़रा,,,
इस दौरान दोस्तों का सहयोग , शमूलियत और शिकायतें
सब साथ साथ रहे... विशेषांक, अपने पाठकों तक पहुँच रहा है
आप चाहें, तो डॉ आनंद सुमन सिंह (मुख्य सम्पादक) से
०९४१२०-०९००० पर संपर्क करके उसे हासिल कर सकते हैं।
आपकी खिदमत में एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ .....
ग़ज़ल
शिकायत भी, तकल्लुफ़ भी, बहाना भी
मुझे, मन्ज़ूर है उसका सताना भी
मुसलसल इम्तेहाँ , बेचैनियाँ पल-पल
न रास आया हमें दिल का लगाना भी
बिना मतलब मेरी तनक़ीद कर-कर के
मुझे वो चाहता है आज़माना भी
नयापन आज का, माना, ज़रूरी है
सुख़न में चाहिए लहजा पुराना भी
हमेशा हम निभाएं तौर दुनिया के ?
कभी सोचे तो आख़िर कुछ ज़माना भी
यक़ीनन, मैं उसे महसूस करता हूँ
कभी ज़ाहिर, कभी कुछ ग़ायबाना भी
हमेशा ज़िन्दगी से इश्क़ फ़रमाया
मिज़ाज अपना रहा कुछ शायराना भी
बुरा वक़्त आये, तो देना जवाब ऐसे
उदास आँखों से 'दानिश' मुस्कराना भी
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तकल्लुफ़=औपचारिकता
मुसलसल=लगातार, निरंतर
तनक़ीद=आलोचना, टीका-टिप्पणी
सुख़न=काव्य-प्रक्रिया, वार्ता
तौर=शैली, पद्वति
ज़ाहिर=स्पष्टत:, प्रकट
ग़ायबाना=अस्पष्ट, अनुपस्थित
मिज़ाज=स्वभाव
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के ग़ज़ल विशेषांक की देख रेख में ही गुज़रा,,,
इस दौरान दोस्तों का सहयोग , शमूलियत और शिकायतें
सब साथ साथ रहे... विशेषांक, अपने पाठकों तक पहुँच रहा है
आप चाहें, तो डॉ आनंद सुमन सिंह (मुख्य सम्पादक) से
०९४१२०-०९००० पर संपर्क करके उसे हासिल कर सकते हैं।
आपकी खिदमत में एक ग़ज़ल ले कर हाज़िर हो रहा हूँ .....
ग़ज़ल
शिकायत भी, तकल्लुफ़ भी, बहाना भी
मुझे, मन्ज़ूर है उसका सताना भी
मुसलसल इम्तेहाँ , बेचैनियाँ पल-पल
न रास आया हमें दिल का लगाना भी
बिना मतलब मेरी तनक़ीद कर-कर के
मुझे वो चाहता है आज़माना भी
नयापन आज का, माना, ज़रूरी है
सुख़न में चाहिए लहजा पुराना भी
हमेशा हम निभाएं तौर दुनिया के ?
कभी सोचे तो आख़िर कुछ ज़माना भी
यक़ीनन, मैं उसे महसूस करता हूँ
कभी ज़ाहिर, कभी कुछ ग़ायबाना भी
हमेशा ज़िन्दगी से इश्क़ फ़रमाया
मिज़ाज अपना रहा कुछ शायराना भी
बुरा वक़्त आये, तो देना जवाब ऐसे
उदास आँखों से 'दानिश' मुस्कराना भी
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तकल्लुफ़=औपचारिकता
मुसलसल=लगातार, निरंतर
तनक़ीद=आलोचना, टीका-टिप्पणी
सुख़न=काव्य-प्रक्रिया, वार्ता
तौर=शैली, पद्वति
ज़ाहिर=स्पष्टत:, प्रकट
ग़ायबाना=अस्पष्ट, अनुपस्थित
मिज़ाज=स्वभाव
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