सभी दोस्तों को सलाम ........!
कुछ अर्सा पहले अंशु प्रकाशन दिल्ली की तरफ़ से
मशहूरो मारूफ़ ग़ज़लकार, एक आलिम फ़ाज़िल शख्सियत
उस्तादे-मोहतरम जनाब 'दरवेश' भारती जी कुशल सम्पादन में
एक नायाब पत्रिका "ग़ज़ल के बहाने" मंज़रे-आम पर आई ....
ग़ज़ल में रूचि रखने वालों के लिए ये रिसाला एक एहम दस्तावेज़
साबित हो रहा है । इस अनूठी पत्रिका में आपके 'मुफलिस' की भी
एक रचना शामिल की गई , सो आज वही ग़ज़ल मैं आप सब
दोस्तों की खिदमत में लेकर हाज़िर हो रहा हूँ .....
उम्मीद है पसंद फरमाएंगे .................................
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ग़ज़ल
वो भली थी, या बुरी, अच्छी लगी
ज़िन्दगी, जैसी मिली, अच्छी लगी
बोझ जो दिल पर था, घुल कर बह गया
आंसुओं की ये नदी अच्छी लगी
चांदनी का लुत्फ़ भी तब मिल सका
जब चमकती धूप भी अच्छी लगी
जाग उट्ठी ख़ुद से मिलने की लगन
आज अपनी बेखुदी अच्छी लगी
दोस्तों की बेनियाज़ी देख कर
दुश्मनों की बेरुखी अच्छी लगी
आ गया अब जूझना हालात से
वक़्त की पेचीदगी अच्छी लगी
ज़हन में 'दानिश' उजाला छा गया
इल्मो-फ़न की रौशनी अच्छी लगी
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Thursday, February 5, 2009
Saturday, January 24, 2009
"बस ये चुप-सी लगी है...नही, उदास नही....
"खामोशी के किन्ही लम्हों में बैठे-बैठे ये प्यारा गीत अचानक ही होंटो पर आ गया फिर सोच में यूँ उभरा कि खामोशी की तो कोई मुद्दत नही होती...जब आती है तो घने कोहरे की तरह ज़हनो-दिल को ढके रहती है....कुछ पल, कुछ लम्हें, कुछ रोज़....लेकिन अन्दर ही अन्दर इक उधेड़ -बुन तो रहती ही है...कभी दिल में उठी ख्वाहिशों को दिमाग हकीक़त का आइना दिखा कर चुप करवा देता है, तो कभी दिमाग की ज़िद के आगे दिल की बेबसी साफ़ नज़र आती है.......ऐसे में खामोश रहना जरुरत भी बन जाता है, और मजबूरी भी.........खैर छोडिए...! चलिए कुछ बातें करते हैं...इसी खामोशी की बातें.....आप सब अदब-नवाज़ दोस्तों की खिदमत में एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूँ....उम्मीद भी है और भरोसा भी....कि आप सराहेंगे भी और कमियाँ भी बतायेंगे ......बस खामोश नही रहेंगे......वादा...?!?
________________________________
ग़ज़ल
हर नफ़स में छिपी है खामोशी
रूह तक जा बसी है खामोशी
ज़िन्दगी की तवील राहों में
हर क़दम पर बिछी है खामोशी
मैं तो लफ्जों की भीड़ में गुम हूँ
औ` मुझे ढूँढती है खामोशी
हो गया हूँ क़रीबतर ख़ुद से
जब से मुझको मिली है खामोशी
बात दिल की पहुँच गई दिल तक
काम कुछ कर गई है खामोशी
राज़े - दिल अब इसी से कहता हूँ
दोस्त बन कर मिली है खामोशी
आरिफ़ाना कलाम होता है
जब कभी बोलती है खामोशी
वक़्त पर काम आ गई आख़िर
dekh कितनी भली है खामोशी
हर घड़ी इम्तेहान लेती है
मुझ में क्या ढूँढती है खामोशी
दिन की उलझन से रूठ कर 'दानिश'
रात - भर जागती है खामोशी
------------------------------------------
नफ़स=साँस तवील=लम्बी
आरिफाना कलाम=ईश्वरीय वाणी
खामोशी में ख के नीचे बिंदी पढ़ें ,
आठवें शेर में (देख) हिन्दी में ही पढ़ें ,
ठीक आता ही नही था
तकलीफ़ के लिए मुआफ़ीचाहता हूँ
---मुफलिस---
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"खामोशी के किन्ही लम्हों में बैठे-बैठे ये प्यारा गीत अचानक ही होंटो पर आ गया फिर सोच में यूँ उभरा कि खामोशी की तो कोई मुद्दत नही होती...जब आती है तो घने कोहरे की तरह ज़हनो-दिल को ढके रहती है....कुछ पल, कुछ लम्हें, कुछ रोज़....लेकिन अन्दर ही अन्दर इक उधेड़ -बुन तो रहती ही है...कभी दिल में उठी ख्वाहिशों को दिमाग हकीक़त का आइना दिखा कर चुप करवा देता है, तो कभी दिमाग की ज़िद के आगे दिल की बेबसी साफ़ नज़र आती है.......ऐसे में खामोश रहना जरुरत भी बन जाता है, और मजबूरी भी.........खैर छोडिए...! चलिए कुछ बातें करते हैं...इसी खामोशी की बातें.....आप सब अदब-नवाज़ दोस्तों की खिदमत में एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूँ....उम्मीद भी है और भरोसा भी....कि आप सराहेंगे भी और कमियाँ भी बतायेंगे ......बस खामोश नही रहेंगे......वादा...?!?
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ग़ज़ल
हर नफ़स में छिपी है खामोशी
रूह तक जा बसी है खामोशी
ज़िन्दगी की तवील राहों में
हर क़दम पर बिछी है खामोशी
मैं तो लफ्जों की भीड़ में गुम हूँ
औ` मुझे ढूँढती है खामोशी
हो गया हूँ क़रीबतर ख़ुद से
जब से मुझको मिली है खामोशी
बात दिल की पहुँच गई दिल तक
काम कुछ कर गई है खामोशी
राज़े - दिल अब इसी से कहता हूँ
दोस्त बन कर मिली है खामोशी
आरिफ़ाना कलाम होता है
जब कभी बोलती है खामोशी
वक़्त पर काम आ गई आख़िर
dekh कितनी भली है खामोशी
हर घड़ी इम्तेहान लेती है
मुझ में क्या ढूँढती है खामोशी
दिन की उलझन से रूठ कर 'दानिश'
रात - भर जागती है खामोशी
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नफ़स=साँस तवील=लम्बी
आरिफाना कलाम=ईश्वरीय वाणी
खामोशी में ख के नीचे बिंदी पढ़ें ,
आठवें शेर में (देख) हिन्दी में ही पढ़ें ,
ठीक आता ही नही था
तकलीफ़ के लिए मुआफ़ीचाहता हूँ
---मुफलिस---
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Thursday, January 8, 2009
ग़ज़ल
दिल की दुनिया में अगर तेरा गुज़र हो जाए
रास्ते साथ दें , आसान सफर हो जाए
जो शनासा - ऐ - रहे - ऐबो - हुनर हो जाए
ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल वो बशर हो जाए
इस तरह नक़्श-ए- क़दम छोड़ कि देखे दुनिया
पाँव रख दे तू जहाँ , राह - गुज़र हो जाए
खौफ़ मरने का, न जीने से शिकायत उसको
जिस पे रहमत से भरी एक नज़र हो जाए
खिल उठी फूल-सी हर शाखे तमन्ना दिल की
अब तो उनसे भी मुलाक़ात अगर हो जाए
अब चलो बाँट लें आपस में वो बीती यादें
ग़म मेरे पास रहें, चैन उधर हो जाए
ख़ुद-ब- ख़ुद शख्स वो मंजिल से भटक जाता है
कामयाबी का नशा उसको अगर हो जाए
ज़िन्दगी जब्र सही , फिर भी जिए जा 'दानिश'
है नही काम ये आसान , मगर, हो जाए।
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शनासा ए रहे ऐबो हुनर= अच्छे बुरे की राह को पहचानने वाला
नक्शे क़दम=पैरों के निशाँ
जब्र=अत्याचार
दिल की दुनिया में अगर तेरा गुज़र हो जाए
रास्ते साथ दें , आसान सफर हो जाए
जो शनासा - ऐ - रहे - ऐबो - हुनर हो जाए
ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल वो बशर हो जाए
इस तरह नक़्श-ए- क़दम छोड़ कि देखे दुनिया
पाँव रख दे तू जहाँ , राह - गुज़र हो जाए
खौफ़ मरने का, न जीने से शिकायत उसको
जिस पे रहमत से भरी एक नज़र हो जाए
खिल उठी फूल-सी हर शाखे तमन्ना दिल की
अब तो उनसे भी मुलाक़ात अगर हो जाए
अब चलो बाँट लें आपस में वो बीती यादें
ग़म मेरे पास रहें, चैन उधर हो जाए
ख़ुद-ब- ख़ुद शख्स वो मंजिल से भटक जाता है
कामयाबी का नशा उसको अगर हो जाए
ज़िन्दगी जब्र सही , फिर भी जिए जा 'दानिश'
है नही काम ये आसान , मगर, हो जाए।
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शनासा ए रहे ऐबो हुनर= अच्छे बुरे की राह को पहचानने वाला
नक्शे क़दम=पैरों के निशाँ
जब्र=अत्याचार
Thursday, January 1, 2009
Tuesday, December 30, 2008
Thursday, December 11, 2008
मेरी कविता
तेज़ , बहुत तेज़ दौड़ती
इस जिंदगी की
भागमभाग से हार कर ,
अजनबियत के सायों से परेशान हो कर ,
अकेलेपन को ओढे हुए
मैं . . .
जब भी कभी
किसी थकी-हारी शाम की
उदास दहलीज़ पर आ बैठता हूँ
तो
सामने रक्खे काग़ज़ के टुकडों पर
बिखरे पड़े
बेज़बान से कुछ लम्हे
मुझे निहारने लगते हैं...
मैं . .
उन्हें.. छू लेने की कोशिश में...
अपने होटों पर पसरी
बेजान खामोशी के रेशों को
बुन बुन कर
उन्हें इक लिबास देने लगता हूँ
और वो तमाम बिखरे लम्हे
लफ्ज़-लफ्ज़ बन
सिमटने लगते हैं....
और अचानक ही
इक दर्द-भरी , जानी-पहचानी सी आवाज़
मुझसे कह उठती है ....
मैं... कविता हूँ ...............!
तुम्हारी कविता .............!!
मुझसे बातें करोगे ......!?!
तेज़ , बहुत तेज़ दौड़ती
इस जिंदगी की
भागमभाग से हार कर ,
अजनबियत के सायों से परेशान हो कर ,
अकेलेपन को ओढे हुए
मैं . . .
जब भी कभी
किसी थकी-हारी शाम की
उदास दहलीज़ पर आ बैठता हूँ
तो
सामने रक्खे काग़ज़ के टुकडों पर
बिखरे पड़े
बेज़बान से कुछ लम्हे
मुझे निहारने लगते हैं...
मैं . .
उन्हें.. छू लेने की कोशिश में...
अपने होटों पर पसरी
बेजान खामोशी के रेशों को
बुन बुन कर
उन्हें इक लिबास देने लगता हूँ
और वो तमाम बिखरे लम्हे
लफ्ज़-लफ्ज़ बन
सिमटने लगते हैं....
और अचानक ही
इक दर्द-भरी , जानी-पहचानी सी आवाज़
मुझसे कह उठती है ....
मैं... कविता हूँ ...............!
तुम्हारी कविता .............!!
मुझसे बातें करोगे ......!?!
Tuesday, December 2, 2008
एक तुम...
एक तुम ,
कि समाये हो जो
शब्द - शब्द की रूह में
सोच के विशाल दायरों में
कल्पना की अथाह उड़ान में
देख पाने की आखिरी मंज़िल तक
स्पर्श की सीमाओं से आज़ाद
महसूस कर पाने की अनुपम परिभाषा में
आकाश के असीम विस्तार में
आदि से अंत तक
अनहद नाद की पावन गूँज में ,
तो फिर .........!!
मिल पाना कैसा .........?
बिछड़ जाना कैसा .......?
कि समाये हो जो
शब्द - शब्द की रूह में
सोच के विशाल दायरों में
कल्पना की अथाह उड़ान में
देख पाने की आखिरी मंज़िल तक
स्पर्श की सीमाओं से आज़ाद
महसूस कर पाने की अनुपम परिभाषा में
आकाश के असीम विस्तार में
आदि से अंत तक
अनहद नाद की पावन गूँज में ,
तो फिर .........!!
मिल पाना कैसा .........?
बिछड़ जाना कैसा .......?
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