Monday, November 23, 2009
कुछ मन का खालीपन ,,,और ऐसा ही कुछ.....!?!
वैसे क़लम भी तो इतना मेहरबान नही रहता मुझ पर कि
अपने खयालात आपसे जल्द-जल्द सांझा करता रहूँ ।
ख़ैर....एक ग़ज़ल ले कर आप की ख़िदमत में हाज़िर हो रहा हूँ ।
अपनी राहनुमाई से नवाज़ेंगे भरोसा है मुझे ............
ग़ज़ल
ज़िक्र न जिन में होगा उसका , उसकी बात न होगी
मेरी, उन तहरीरों की कोई औक़ात न होगी
मौसम की दावत है , अब तो , कुछ मनमानी कर लें
उम्र गुज़र जाने पर हासिल ये सौग़ात न होगी
अब पहले-सा वक्त नहीं , खुश-फ़हमी में मत रहना
सच की राह पे चल दोगे, तो तुम को मात न होगी
उट्ठो , जागो , दुश्मन की हर हरक़त को पहचानो
क्या तब तक ख़ामोश रहोगे जब तक घात न होगी?
क्या इक ऐसा दौर भी होगा , वो युग भी आयेगा
इन्सां की पहचान जहाँ , मज़हब या ज़ात न होगी !
एक झलक, बस एक झलक, बस एक झलक हसरत है
दीद की प्यासी आंखों को कब तक खैरात न होगी?
दिल का दर्द घनेरा अब आंखों तक घिर आया है
बादल दूर न होंगे अब , जब तक बरसात न होगी
रास नहीं आई तुझको रिश्तों की तल्ख़ हक़ीक़त
ऐसी ख़ुद से भी दूरी 'दानिश' बिन बात न होगी
तहरीरों=लिखितें/लेखन
औकात=स्तर
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Monday, November 9, 2009
तो कुछ भी कह लो, सुन लिया जाता है ...
अब आख़िर खामोशी के ज़ेवर को उतार कर
कहाँ रख दिया जाए ...शकील ने भी तो कहा है
ज़रा तू ही बता ऐ दिल सुकूँ पाने कहाँ जाएं...
khair...ab अल्फ़ाज़ की बुनावट है या बनावट ,
एक नज़्म हाज़िर है .......
मैंने ...देखा उसे
मैंने देखा उसे
दूर तक ....
खालीपन में...
घंटों....
टकटकी लगा.. देखते हुए
मैंने देखा उसे
ख़ुद ही से रूठ कर
ख़ुद ही पर
एक बेजान-सी खामोशी
ओढे हुए....
मैंने देखा उसे
किसी भी हालात का
शिकवा किए बगैर
बस अपने आप ही से
झगड़ते हुए....
और... .
जब कभी....
उसके क़रीब जा कर
मैंने
ज़रा सा छुआ जो उसे ...
तो...
मैंने देखा उसे
... झट से
अपनी पलकों के कोनों पर उभर आई
नमी को पोंछ ...
बक-बक बड़बड़ाते हुए
बिना वजह ही .....
हँसते हुए....,
बिन बात मुस्कराते हुए.....!!
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Thursday, October 22, 2009
ये गीत ज़हनमें आ गया ..आप सब ने तो सुना ही होगा ...
तसव्वर कीजिये ...ज़िन्दगी कई बार इंसान को इम्तिहानात
और आज़माईश में डाल कर ख़ुद जीत जाती है ...हालात ऐसे
न-साज़गार कि मन का भारीपन होटों की बेजान खामोशी में
तब्दील हो जाता है ..वक़्त की बेरूखी आंखों के खालीपनको भांप कर
और भी शदीद हो उठती है । काश ! बेबसी, कभी इंसान पर इस क़दर
भी न हावी होने पाये ...और ऐसे में खुदावंद का नाम तो
यक़िननबहुत बड़ा संबल बन जाता है ........
ग़ज़ल
दाता , नाम कमाई दे
साँसों में सच्चाई दे
दर्द-ओ-ग़म हँसके सह लूँ
हिम्मत को अफ़्ज़ाई दे
मेहनत-कश लोगों को तू
मेहनत की भरपाई दे
शोरो-गुल में क़ैद हूँ मैं
अब थोड़ी तन्हाई दे
चैन मिले जो यूँ उसको
दे , मुझको , रुसवाई दे
कह लूँ दिल की बात तुम्हें
लफ्ज़ों को सुनवाई दे
एक सनम मेरा भी हो
मुख़लिस , या हरजाई , दे
हर दिल में हो नाम तेरा
हर दिल को ज़ेबाई दे
मेरे नेक ख़यालों को
वुसअत औ` गहराई दे
आँखें रिमझिम भीग सकें
यादों की पुरवाई दे
आँगन-आँगन खुशियाँ हों
घर-घर में रा' नाई दे
कर मुझको तौफ़ीक़ अता
'दानिश' को अगुवाई दे
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afzaaee = vriddhee,,, मुख़लिस=निष्कपट
हरजाई=निष्ठाहीन,,, ज़ेबाई = नैसर्गिक सौन्दर्या
वुस अत=विस्तार,,, रा`नाई= सुन्दरता
मुफ़लिस=मासूम/गरीब
तौफ़ीक़=ईश्वरीय सामर्थ्य
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Wednesday, September 30, 2009
इस तिथि को हम सब राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी जी और हमारे
भूतपूर्व प्रधान-मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के जनम दिवस
के रूप में मनाते हैं....शास्त्री जी की सादगी और स्वाभिमान पर
और गाँधी जी के अहिंसा के सिद्धांत पर हम सब को गर्व है .......
महात्मा गाँधी जी के व्यक्तित्व को शब्दों में बाँधना आसान नही ।
एक गीतनुमा कविता प्रस्तुत है ..राष्ट्रपिता को श्रद्धांजली .....
गीत
भारत जब जब दोहराएगा आज़ादी के गान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को
लन्गोती वाले बाबा की , ऐसी एक लड़ाई थी
ना गोला बरसाया कोई , ना तलवार चलाई थी
सत्य अहिंसा के बल पर दुश्मन को धूल चटाई थी
मन की ताक़त ही से उसने रोका हर तूफ़ान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...
सच की लाठी हाथों में ली, तन पर भक्ति का चोला
पाठ अहिंसा का सिखला कर हर मन में अमृत घोला
आज़ादी के रंग में रँग कर हर भारतवासी बोला
भारत माँ पर अर्पण कर देंगे हम अपनी जान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...
खादी के ताने-बाने से भारत का इतिहास रचा
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब में इक विश्वास रचा
सहम गया कुख्यात फिरंगी ऐसा इक अभ्यास रचा
मान गया अंग्रेजी शासन बापू की पहचान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को...
जिस गांधी ने सारे जग में हिन्दुस्तां का नाम किया
उस पर ही इक घातलगा कर अनहोनी ने काम किया
बापू ने बस राम कहा, चिर-निद्रा में विश्राम किया
वक्त नमन करता है हर पल सच्चाई की शान को
सब-जन तब-तब याद करेंगे बापू के बलिदान को .
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Tuesday, September 8, 2009
ज़िन्दगी और मस्रुफियात का भी अजीब सा लेकिन पक्का रिश्ता है
फुर्सत के लम्हे चुरा पाना भी अपने आप में महारत ही है ।
इंसान , आज , जाने कयूं बस अपने आप के बारे में ही सोचने की फितरत
पाले रहने पर मजबूर सा होता जा रहा है । वजह.... वक्त है , हालात हैं , या
हमारा ये चौतरफा ....भाग-दौड़ वाला.... ख़ुद भागता-दौड़ता चौतरफा ....
खैर ....ये कहानी फिर सही ....
आप सब की खिदमत में एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर हूँ ......
ग़ज़ल
किसी के कोई काम आओ , तो मानें
कि ख़ुद को कभी आज़माओ, तो मानें
खुशी के पलों में तो हँसते रहे हो
मुसीबत में भी मुस्कराओ , तो मानें
बनावट- नुमा ज़िन्दगी छोड़ कर तुम
हकीक़त से रिश्ता बनाओ , तो मानें
हमेशा चरागों तले है अँधेरा
भरम ये कभी तोड़ पाओ , तो मानें
रहो सामने भी , छिपे भी रहो तुम
मुहब्बत में इतना सताओ , तो मानें
किसी और में खोट कयूं ढूँढ़ते हो
कभी ख़ुद को दरपन दिखाओ, तो मानें
नए दौर के साथ चलते हुए तुम
पुरातन की रस्में निभाओ , तो मानें
परों की नही , बात है हौसलों की
इरादे फ़लक तक बनाओ , तो मानें
खफा हो के मुझसे , कहा ज़िन्दगी ने
मेरे नाज़ हर पल उठाओ , तो मानें
कई ग़मज़दा लोग, 'दानिश', मिलेंगे
उन्हें भी गले से लगाओ , तो मानें
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Tuesday, August 25, 2009
कोई वक्त था कि
खतों कि बड़ी एहमियत हुआ करती थी ....ख़त लिखना , ख़त पढ़ना ,
ख़त का इंतज़ार करना सभी कुछ बहुत अच्छा लगता था ...
और वो ख़त..... जो मानिए आँख की सियाही से लिखे गए हों ...
आंखों में उभरते कतरों के साथ पढ़े गए हों ...
उन खतों की कैफ़ियत का अंदाज़ा तो आप को मालूम
ही होगा ....... खैर ! एक नज़्म आपकी खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ ।
वो ख़त
अभी अभी .......अचानक
दिल में इक एहसास ने अंगडाई ली
एक जाना-पहचाना ,
अपना-सा एहसास
यूँ लगा .....
जैसे
तेरा धुंधला सा कोई अक्स
तेरा खुशबु से भरा इक ख़याल
तेरे क़दमों की मखमली-सी इक आहट
तेरे हाथों की रेशम-सी इक छुअन
ये सब... .
मेरे ज़हनो-दिल को गुदगुदाते हुए
जैसे....
मुझे छू कर गुज़र गए हैं
हाँ ! याद आया !!
आज
तेरे उस ख़त को
देर तक पढ़ते-पढ़ते....
मैंने ....
अपनी थकी-मांदी
पलकों पर रख छोड़ा था
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Monday, August 10, 2009
kavita
अपना ही लुत्फ़ है । कई विद्वान् रचनाकारों द्वारा अच्छी-अच्छी
कविताएँ लिखी जाती हैं और पढने वालों तक ब.खूबी पहुंचाई
जा रही हैं । मन में एक नज़्म का ख़याल आया है ।
अब एक अदना-सी कोशिश है
जो भी है ....मन से है ...मन के लिए है ...आप सब के लिए है ।
उधेड़-बुन
मन की उकताहट ,
मन की बेकली .....
अचानक जब टीस बन करवट लेती है...तो...
जाने कयूं
चुभने-चुभने सा लगता है सब ...
आंखों का सूनापन
होटों पर पसरी चुप्पी
ख़ुद ही से बेगानगी
बेतरह सी उदासी
और कहीं......
अन्दर ही अन्दर
चल पड़ती है इक उधेड़-बुन .....
जैसे
आँख के किसी बेजान क़तरे को
बड़ी हिफाज़त से
लफ्जों में तब्दील करने की कोशिश
ज़हनमें कुलबुलाते किसी गुबार को
खयाली लिबास देने की तड़प
सोच , एहसास , जज़्बात को
इज़हार देने की छटपटाहट ......
और......धीरे-धीरे....
कुछ नक़्श ......
उभरने भी लगते हैं.....
लम्हा-लम्हा पिघलती रात की आगोश में
जाने क्या-क्या समाता चला जाता है
और अगली सुबह ......
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
बिखरे पड़े अल्फाज़ को
मैं .......
निहारता हूँ....
फिर अपनी किताबों में संभाल कर रख कर
सोचने लगता हूँ
मानो ....
मैंने कोई कविता कह ली हो ......
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